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Bhopal Farmers Protest: भोपाल में क्यों जुटे हजारों किसान? Madhya Pradesh farmers protest | CM Mohan

Wed, 29 Jul 2026 12:56 PM IST
Adarsh Jha अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम

अनाज की बोरियां, बिस्तर, बर्तन और हफ्तेभर का राशन ये किसी यात्रा की तैयारी नहीं, बल्कि एक लंबे आंदोलन का ऐलान है। मध्य प्रदेश में हजारों किसान राजधानी भोपाल की दहलीज तक पहुंच चुके हैं। पुलिस की बैरिकेडिंग टूट चुकी है और किसान साफ कह रहे हैं जब तक मूंग की पूरी फसल की खरीद की गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक वापसी नहीं होगी। आखिर किसानों की मांग क्या है? सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्यों खड़ी हो गई है? देखिए ये रिपोर्ट।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इन दिनों किसानों के बड़े आंदोलन का केंद्र बन गई है। करीब दो हजार किसान अनाज की बोरियां, बिस्तर, खाना बनाने के बर्तन और एक सप्ताह का राशन लेकर राजधानी के बाहरी इलाके में पहुंच चुके हैं। मंगलवार को किसानों ने शहर के दक्षिणी छोर पर लगी पुलिस बैरिकेडिंग भी तोड़ दी। अब यह आंदोलन मुख्यमंत्री मोहन यादव सरकार के सामने इस साल की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौतियों में से एक माना जा रहा है।

संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले 19 किसान संगठनों के प्रतिनिधि इस आंदोलन में शामिल हैं। किसानों ने साफ कहा है कि जब तक सरकार मूंग की फसल की 100 प्रतिशत खरीद की घोषणा नहीं करती और खाद वितरण से जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं करती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।

दरअसल, किसानों की सबसे बड़ी मांग मूंग की फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर शत-प्रतिशत खरीद है। किसान संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार तुअर, उड़द और मसूर जैसी दालों की पूरी खरीद एमएसपी पर कर रही है, लेकिन मूंग की खरीद अभी भी मूल्य समर्थन योजना के तहत होती है। इस योजना में खरीद राज्य के अनुमानित उत्पादन के केवल 25 प्रतिशत तक सीमित रहती है।

किसानों का कहना है कि इस सीमा की वजह से उन्हें अपनी बड़ी मात्रा में उपज खुले बाजार में बेचनी पड़ती है, जहां कीमतें एमएसपी से काफी कम मिलती हैं। वर्ष 2026-27 के लिए मूंग का एमएसपी 8,768 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, लेकिन बाजार में उन्हें इससे काफी कम दाम मिल रहे हैं।

किसान नेता संतोष पटवारी का कहना है कि पिछले 20 दिनों से किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार को कई ज्ञापन भेजे गए, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला। ऐसे में किसानों के पास भोपाल मार्च और मुख्यमंत्री आवास तक पहुंचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा।

यह आंदोलन नर्मदापुरम से शुरू हुआ था। किसान पहले सेठानी घाट पर एकत्र हुए और वहां से भोपाल की ओर कूच किया। शुरुआत में प्रशासन ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन बाद में बैरिकेड हटाकर आगे बढ़ने की अनुमति दे दी। मंगलवार को किसान ओबैदुल्लागंज और रायसेन होते हुए राजधानी के करीब पहुंच गए। इस दौरान पुलिस ने टोल प्लाजा और मंडीदीप सीमा सहित कई जगहों पर फिर से बैरिकेड लगाए और किसान नेताओं से ज्ञापन सौंपकर लौटने की अपील की, लेकिन किसान अपनी मांगों पर अड़े रहे।

किसान संगठनों का आरोप है कि रायसेन, विदिशा, हरदा, नर्मदापुरम और बुधनी जैसे जिलों से आने वाले समर्थकों को रोकने के लिए प्रशासन गांवों से बाहर जाने वाली सड़कों पर भी बैरिकेड लगा रहा है। हालांकि प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि पुलिस की तैनाती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई है।

इस आंदोलन ने ग्रामीण इलाकों में बढ़ते असंतोष को भी सामने ला दिया है। किसान संगठनों का कहना है कि खरीद में देरी, सीमित कोटा, रजिस्ट्रेशन की दिक्कतें और खाद की कमी जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। बढ़ती लागत और बाजार में कम कीमतों के कारण अच्छी पैदावार के बावजूद किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कुछ महीने पहले उज्जैन में भूमि अधिग्रहण और लैंड पूलिंग नीति को लेकर हुए विरोध के बाद सरकार को अपने फैसले में बदलाव करना पड़ा था। ऐसे में अब मूंग खरीद को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन मोहन यादव सरकार के लिए एक और बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन गया है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार किसानों की मांगों पर क्या फैसला लेती है और क्या बातचीत के जरिए इस टकराव का समाधान निकल पाता है।

मूंग की खरीद का मुद्दा अब सिर्फ फसल का नहीं, बल्कि किसानों के भरोसे और सरकार की साख का सवाल बन गया है। आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली बातचीत इस आंदोलन की दिशा तय करेगी।

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