असम में UCC विधेयक पारित होने पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, "उत्तराखंड से एक ड्राफ्ट बिल बना था। इसके बाद गुजरात में कुछ सुधार हुआ। असम के हालातों के साथ हमने इसे बनाया है। इस बिल पर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यहां कानून बनेगा और लागू होगा। लागू होने के दौरान अगर ऐसा महसूस हुआ कि कुछ संशोधन करना चाहिए तो वे जरूर होगा.मुझे नहीं लगता है कि इसे लागू करने में कोई परेशानी आएगी।"
Assam विधानसभा ने बुधवार को बहुचर्चित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसके साथ ही असम, Uttarakhand और Gujarat के बाद यूसीसी लागू करने वाला देश का तीसरा तथा पूर्वोत्तर भारत का पहला राज्य बन गया है। मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की सरकार द्वारा लाया गया यह विधेयक पिछले कई दिनों से राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ था। विधानसभा में इस पर लंबी और तीखी चर्चा हुई, जिसमें सत्तापक्ष ने इसे सामाजिक सुधार और महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बताया, जबकि विपक्षी दलों ने इसे जल्दबाजी में लाया गया और सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौतीपूर्ण कानून करार दिया।
यूसीसी विधेयक का उद्देश्य राज्य में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे निजी मामलों में सभी समुदायों के लिए एक समान कानून लागू करना है। विधेयक में बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य बनाया गया है। यदि कोई व्यक्ति बिना पंजीकरण के लिव-इन संबंध में रहता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। सरकार का कहना है कि यह कानून महिलाओं को अधिक सुरक्षा और समान अधिकार देने के लिए लाया गया है।
विधानसभा में विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस और एआईयूडीएफ ने इस विधेयक का जोरदार विरोध किया। विपक्ष का कहना था कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता को प्रभावित कर सकता है। कई विपक्षी विधायकों ने मांग की कि विधेयक को विस्तृत अध्ययन के लिए प्रवर समिति के पास भेजा जाए, लेकिन सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया। सदन में हंगामे और नारेबाजी के बीच आखिरकार विधेयक को पारित कर दिया गया।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि यूसीसी का उद्देश्य किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करना है। उन्होंने दावा किया कि यह कानून विशेष रूप से महिलाओं और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करेगा। सरमा ने इसे “न्याय और समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम” बताया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असम में यूसीसी लागू होने के बाद देशभर में इस मुद्दे पर बहस और तेज हो सकती है। भाजपा इसे अपने प्रमुख वैचारिक एजेंडे की बड़ी सफलता मान रही है, जबकि विपक्ष इसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों के राजनीतिकरण के रूप में देख रहा है। आने वाले समय में इस कानून को लेकर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बहस जारी रहने की संभावना है।