आम आदमी पार्टी (आप) और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के बीच की तकरार अब सामने आ गई है। इस मामले ने एक बार फिर आप के भीतर चल रही उथल-पुथल को उजागर कर दिया है। राघव चड्ढा ने सीधे तौर पर पार्टी के फैसले पर प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर इशारों में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि 'मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझ लेना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है'। इसी बीच अब चर्चा होने लगी है की राघव आम आदमी पार्टी से अलग हो जाएंगे या हो सकते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस आप पार्टी से जुड़े वो कौन से बड़े नाम हैं जिन्होंने पार्टी को छोड़ा, इसके साथ ही ये भी जानेंगे की वो कब और क्यों अलग हुए।
आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर एक बार फिर अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आते नजर आ रहे हैं। इस बार मामला राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा से जुड़ा है, जिनकी हालिया प्रतिक्रिया ने पार्टी की आंतरिक राजनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। हालांकि राघव चड्ढा ने सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व या फैसलों पर हमला नहीं बोला, लेकिन सोशल मीडिया पर साझा किए गए उनके एक वीडियो ने कई संकेत जरूर दे दिए हैं।
राघव चड्ढा ने अपने संदेश में कहा, “मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है।” उनके इस बयान को पार्टी के भीतर चल रही खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ समय से राघव चड्ढा पार्टी के अहम मुद्दों पर अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहे थे, जो अब इस बयान के जरिए सामने आया है।
दरअसल, पार्टी और राघव चड्ढा के बीच दूरी की चर्चा तब तेज हुई जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जेल में थे और उस दौरान राघव चड्ढा लंदन में अपनी निजी जिंदगी की तस्वीरें साझा कर रहे थे। इसके अलावा लोकसभा चुनाव के दौरान भी उन्हें पंजाब की राजनीति से दूर रखा गया, जिससे अटकलों को और बल मिला।
हालांकि, पार्टी नेतृत्व इस पूरे विवाद को सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया बता रहा है। AAP के वरिष्ठ नेता संजय सिंह और नए उपनेता डॉ. अशोक कुमार मित्तल का कहना है कि यह बदलाव संगठन को मजबूत करने और अन्य नेताओं को जिम्मेदारी देने के उद्देश्य से किया गया है।
अगर AAP के इतिहास पर नजर डालें तो यह पहली बार नहीं है जब पार्टी के भीतर मतभेद सामने आए हों। पार्टी के गठन के बाद से ही कई बड़े नाम अलग हो चुके हैं, जिन्होंने समय-समय पर पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाए।
प्रशांत भूषण, जो पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे, उन्होंने पार्टी पर व्यक्ति केंद्रित होने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी है और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए थे। इसी तरह शाजिया इल्मी ने भी 2015 में पार्टी छोड़ते हुए आंतरिक लोकतंत्र की कमी का मुद्दा उठाया था।
योगेंद्र यादव, जो AAP के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते थे, उन्होंने भी पार्टी से अलग होने के बाद कहा था कि AAP अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई है और पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों जैसी होती जा रही है। उन्होंने बाद में स्वराज अभियान नाम से अपनी अलग राजनीतिक पहल शुरू की।
कुमार विश्वास का मामला भी काफी चर्चित रहा। उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी में गलत कामों का विरोध करने पर उन्हें किनारे कर दिया गया। वहीं कपिल मिश्रा ने तो अरविंद केजरीवाल पर सीधे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे, जिसके बाद उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
हाल के समय में स्वाति मालीवाल का मामला भी पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ, जिसमें उन्होंने पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए थे। इस घटना ने भी पार्टी की छवि पर असर डाला।
अब राघव चड्ढा का मामला सामने आने के बाद विपक्ष ने AAP की एकता और नेतृत्व शैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्षी दल इसे पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि का संकेत बता रहे हैं।
वहीं, राघव चड्ढा ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि वे संसद में लगातार आम जनता से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं, जैसे महंगाई, टोल टैक्स, बैंक शुल्क, डिलीवरी कर्मचारियों की समस्याएं और टेलीकॉम कंपनियों की नीतियां। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे मुद्दे उठाने से पार्टी को कैसे नुकसान हो सकता है।
कुल मिलाकर, AAP के भीतर चल रही यह खींचतान आने वाले समय में पार्टी की राजनीति और रणनीति पर बड़ा असर डाल सकती है। अब देखना होगा कि पार्टी इस स्थिति को कैसे संभालती है और क्या यह विवाद आगे और गहराता है या फिर सुलझ जाता है।