सरस्वती नदी पहाड़ों को तोड़ती हुई निकलती थी और मैदानों से होती हुई अरब सागर में जाकर विलीन हो जाती थी। इसका वर्णन ऋग्वेद में बार-बार आता है। कई मंडलों में इसका वर्णन है। ऋग्वेद वैदिक काल में इसमें हमेशा जल रहता था। सरस्वती आज की गंगा की तरह उस समय की विशालतम नदियों में से एक थी। उत्तर वैदिक काल और महाभारत काल में यह नदी बहुत कुछ सूख चुकी थी। तब सरस्वती नदी में पानी बहुत कम था। लेकिन बरसात के मौसम में इसमें पानी आ जाता था। भूगर्भी बदलाव की वजह से सरस्वती नदी का पानी गंगा में चला गया, कई विद्वान मानते हैं कि इसी वजह से गंगा के पानी की महिमा हुई, भूचाल आने के कारण जब जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का पानी यमुना में गिर गया। इसलिए यमुना में सरस्वती का जल भी प्रवाहित होने लगा। सिर्फ इसीलिए प्रयाग में तीन नदियों का संगम माना गया, जबकि यथार्थ में वहां तीन नदियों का संगम नहीं है। सरस्वती एक पौराणिक नदी जिसकी चर्चा वेदों में भी है। इसे प्लाक्ष्वती,वेद्समृति, वेदवती भी कहते है! ऋग्वेदमें सरस्वती का अन्नवती तथा उदकवती के रूप में वर्णन आया है। यह नदी सर्वदा जल से भरी रहती थी और इसके किनारे अन्न की प्रचुर उत्पत्ति होती थी। कहते हैं, यह नदी हिमाचल में सिरमौरराज्य[1] के पर्वतीय भाग से निकलकर अंबाला तथा कुरुक्षेत्र,कैथल होती हुई पटियाला राज्य में प्रविष्ट होकर सिरसा जिले की दृशद्वती (कांगार) नदी में मिल गई थी। कपालमोचन तीर्थ से स्नान करने के बाद काफी संख्या में श्रद्धालु सरस्वती उद्गम स्थल से बह रही पानी की धारा को पीकर और बोतल में पानी को भर कर लेकर जाते हैं। पंजाब के पटियाला जिले से पहुुंचे कई श्रद्धालुओं ने इसकी महिमा के बारे में बताया और कहा कि सरस्वती की बह रही धारा को पीकर कई बिमारियां भी ठीक होती हैं,क्योंकि यह जल धारा पहाड़ों के बीच से निकलते हुए कई जड़ी बूटियों को के बीच से होकर आती है। सरस्वती को ज्ञान और बुद्धि की देवी माना जाता है, इसलिए श्रद्धालु उनके पवित्र जल को घर ले जाते हैं।