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जमीयत उलमा हिंद कोई राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि विशुद्ध धार्मिक संगठन : मौलाना सैयद अशहद रशीदी

पानीपत। जमीयत उलमा मुत्तहिदा पंजाब व हिमाचल प्रदेश की मजलिस-ए-मुन्तज़िमा का सम्मेलन रविवार को पानीपत के पत्थरगढ़ गांव में हुआ। मुख्यातिथि जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हजरत मौलाना सैयद अशहद रशीदी ने कहा कि जमीयत उलमा हिंद के बारे में एक बात हर व्यक्ति को अपने मन में अच्छी तरह बैठा लेनी चाहिए कि जमीयत कोई राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि एक विशुद्ध धार्मिक संगठन है। यह संगठन धर्म के दायरे में रहते हुए भारत और भारत में रहने वाले सभी लोगों की सेवा को अपना उद्देश्य मानता है। उन्होंने कहा कि जब देश में चुनाव होते हैं, तब जमीयत उलमा हिंद चुनावी राजनीति में भाग लेने के लिए मैदान में नहीं उतरती। जमीयत का मूल उद्देश्य बेसहारा लोगों को सहारा देना, बेगुनाहों की रिहाई के लिए कानूनी प्रयास करना और पीड़ितों की मदद करना है। मोहब्बत बांटना, मानवता की सेवा करना और लोगों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देना जमीयत का काम है, न कि नफरत फैलाना। देश और समाज के हित में जमीयत जिस कार्य को आवश्यक और उचित समझती है, उसके लिए अपनी सेवाएं और कुर्बानियां पेश करती है। हज़रत मौलाना सैयद अशहद रशीदी ने जमीयत उलमा हिंद की ऐतिहासिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग एक सदी पहले, जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था और अत्याचार एवं दमन के जरिए सत्ता को मजबूत बनाए रखने की कोशिश की जाती थी, उस समय जमीयत उलमा हिंद के बुजुर्गों ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि लोगों को धर्म और समुदाय के नाम पर बांटकर शासन करने की नीति के मुकाबले एकता, स्वतंत्रता और आपसी सद्भाव का संदेश देना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। जमीयत के बुजुर्गों ने इस दिशा में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उन्होंने विशेष रूप से हजरत शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी रहमतुल्लाह अलैह और उनके शिष्य हज़रत मौलाना सैयद हुसैन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैह की कुर्बानियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन महान विद्वानों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया और माल्टा में कैद की कठिनाइयां सहन कीं। मौलाना रशीदी ने ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि अंग्रेजों के अत्याचार सहने के बाद जब ये बुजुर्ग अपने वतन लौटे, तो विभिन्न धर्मों के लोगों ने उनकी कुर्बानियों और दृढ़ता का सम्मान किया। यह इस बात का प्रतीक था कि भारत की आजादी की लड़ाई किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें विभिन्न धर्मों के लोगों ने अपना योगदान दिया था। उन्होंने आगे कहा कि जमीयत उलमा हिंद का इतिहास हमें यह सीख देता है कि देश के निर्माण और उसकी रक्षा के लिए आपसी एकता तथा एक-दूसरे के सम्मान को प्राथमिकता देनी चाहिए। धर्म के नाम पर नफरत पैदा करने के बजाय इंसानों के बीच प्रेम और विश्वास के रिश्तों को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। हजरत मौलाना सैयद अशहद रशीदी ने सम्मेलन में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि आज आप सभी यहां से हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश लेकर जाएं। दोनों समुदायों के बीच प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा दें तथा अपने अच्छे आचरण से लोगों के दिल जीतें। यदि किसी स्थान पर आप स्वयं को अकेला महसूस करें तो अपनी खुशमिजाजी, अच्छे व्यवहार और मोहब्बत के जरिए दूसरों को अपना बनाएं। अपने अच्छे गुणों को इस तरह प्रस्तुत करें कि गलतफहमियां दूर हों और आपसी विश्वास मजबूत हो। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य नफरत की दीवारों को गिराना और देश में अमन-शांति, प्रेम तथा भाईचारे को मजबूत करना होना चाहिए। भारत की खूबसूरती उसकी गंगा-जमुनी तहजीब, विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों के आपसी सम्मान और साझा राष्ट्रीय जीवन में है। यदि हम एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागी बनें और मतभेदों के बावजूद सम्मान बनाए रखें, तो समाज में शांति और एकता को और मजबूत किया जा सकता है। मौलाना सैयद अशहद रशीदी ने अपने संबोधन के अंत में जोर देकर कहा कि जमीयत उलमा हिंद के संघर्ष का मूल संदेश मानवता की सेवा, पीड़ितों की सहायता, राष्ट्रीय एकता और धार्मिक सद्भाव है। उन्होंने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे प्रेम, शांति और एकता के इस संदेश को अपने-अपने क्षेत्रों तक पहुंचाएं, ताकि नफरत के स्थान पर मोहब्बत को बढ़ावा मिले और भारत तरक्की, खुशहाली तथा भाईचारे के रास्ते पर आगे बढ़ता रहे।

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