मानसून के दौरान हथिनीकुंड बैराज में पानी की आवक बढ़ने के बावजूद यमुना नदी में छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा में खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (सैंड्रा) की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, एक से पांच जुलाई के बीच हथिनीकुंड बैराज में पानी का औसत बहाव 192 क्यूमेक से बढ़कर 242 क्यूमेक हो गया, लेकिन यमुना में केवल 9.97 क्यूमेक (करीब 352 क्यूसेक) पानी छोड़ा गया। बाकी अधिकांश पानी पश्चिमी और पूर्वी यमुना नहरों में भेज दिया गया। आठ और नौ जुलाई को भी बहाव 390 और 442 क्यूमेक तक पहुंचा, फिर भी नदी में छोड़ा गया पानी लगभग उसी स्तर पर बना रहा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में यमुना पहले से ही सीवेज, औद्योगिक कचरे और नालों के पानी की वजह से प्रदूषित है। ऐसे में मानसून के दौरान पर्याप्त पानी न मिलने से नदी की खुद को साफ करने, गाद बहाने और बाढ़ क्षेत्र को रिचार्ज करने की प्राकृतिक क्षमता कमजोर हो रही है। इस पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता जताते हुए कहा कि इससे नदी की सेहत और प्रदूषण पर बुरा असर पड़ सकता है।
यमुना विशेषज्ञ भीम सिंह रावत ने कहा कि मानसून में नदी को उसके प्राकृतिक बहाव का कम से कम 75 प्रतिशत पानी मिलना चाहिए। उनका कहना है कि पर्याप्त पर्यावरणीय बहाव के बिना केवल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं से यमुना को पूरी तरह साफ नहीं किया जा सकता। उन्होंने सरकार से नदी में पर्याप्त पानी छोड़ने पर भी समान रूप से ध्यान देने की मांग की।