घिरी-घिरी आई बदरिया रे... हो बदरिया रे... एक तरफ राजधानी में रात से बरस रहे बदरा ने मौसम सुहाना किया, वहीं दूसरी तरफ कमानी ऑडिटोरियम में गायिका ने सावन की कजरी से लोगों को भिगोना शुरु कर दिया। कहते हैं मतवाले सावन में विरहिणी का दिल कांपता ही नहीं, झूमता भी है। जैसे सावन में प्रकृति शीतलता की चादर ओढ़ लेती है, वैसे ही पिया मिलन और प्रेम वियोग में स्त्री का मन भी व्याकुल हो उठता है। पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने जैसे ही मधुर शुरुआत की दर्शक अपनी सीटों पर बैठे कजरी की मस्ती में झूमने लगे। इस कजरी में केवल सावन ही नहीं था, इसमें था सावन में पिया से वियोग, मिलन, भादों के प्रेम और खाली बरसात। कमानी ऑडिटोरियम में बृहस्पतिवार को आयोजित सावन कार्यक्रम में पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने कजरी और झूला की मधुर प्रस्तुति दी। लगभग दो घंटे की इस सुरमयी यात्रा ने कजरी, झूला, मल्हार, विंटेज ठुमरी और दुर्लभ गजलों के माध्यम से सावन की मोहकता को जीवंत कर दिया। शायद इसलिए कहते हैं कि सावन का सौंदर्य और वर्षा बहार का जो वर्णन लोक गायन की विधा कजरी में है वह कहीं और नहीं। सावन कार्यक्रम पर अपने विचार रखते हुए मालिनी अवस्थी ने कहा, वर्षा का आगमन, धरती ही नहीं, हम सबके तन-मन में आशा उमंग और प्रसन्नता लेकर आता है। संगीत ने सदा प्रकृति से प्रेरणा ली है, इसीलिए वर्षा को उत्सव के रूप में मानने जाने की परंपरा है। आकाश में घिरे बादलों की रिमझिम बूंदाबांदी के बीच नहाए हुए वृक्ष, नाचते मयूर कुहुकते पंछी, हरियाए खेत खलिहान ताल नदियां, सब कुछ मोहित कर देने वाला होता है। ऐसे में गाय जाने वाले राग-रागिनी मल्हार हो या ठुमरी, कजरी, झूला, सावनी ऐसे कर्णप्रिय रस छंद सावन के श्रृंगार हैं। ये गीत हमारी सामूहिक स्मृति को प्रतिध्वनित करते हैं जो पीढ़ियों को जोड़ती है।