नोएडा स्टेडियम में लगे एक स्टॉल पर पारंपरिक पहाड़ी शिल्प अपनी अलग पहचान बना रहा है। स्टॉल संचालिका नारायणी देवी बताती हैं कि वह उत्तराखंड के लोहाघाट की रहने वाली हैं। उनका परिवार कई पीढ़ियों से हाथों से लोहे के बर्तन बनाने का कार्य करता आ रहा है और आज वह स्वयं इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। नारायणी देवी पिछले पांच वर्षों से नोएडा आकर स्टॉल लगा रही हैं। उनका कहना है कि लोहाघाट की पहचान वहां हाथ से बनाए जाने वाले लोहे के बर्तनों से है, जो अपनी मजबूती और गुणवत्ता के लिए काफी प्रसिद्ध हैं। ये बर्तन चीड़ की लकड़ी के छिलकों की आग में गर्म कर तैयार किए जाते हैं, जिससे लोहे की शुद्धता आम लोहे की तुलना में अधिक होती है। वह बताती हैं कि ऐसे लोहे के बर्तनों में पकाया गया भोजन शरीर में आयरन की कमी को दूर करने में सहायक होता है। इसी कारण आज भी लोग इन बर्तनों को स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर मानते हैं। उनके स्टॉल पर लोहे की कढ़ाई, करछी, चाकू, दरांती सहित कई उपयोगी सामान उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत लगभग 300 रुपये प्रति किलो है। पहाड़ों में महिलाओं की स्थिति पर बात करते हुए नारायणी देवी कहती हैं कि रोजगार के अवसरों की कमी के कारण लोगों को बाहर आकर काम करना पड़ता है। बच्चों की शिक्षा और रोजगार इसकी सबसे बड़ी वजह है। वह भावुक स्वर में कहती हैं, पहाड़ की महिलाओं के हिस्से संघर्ष और कठिन परीक्षाएं ही आती हैं। उन कठिन रास्तों को पार करते हुए आज यहां तक पहुँचना मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि है। नारायणी देवी की कहानी न केवल आत्मनिर्भरता की मिसाल है, बल्कि पहाड़ी परंपरा और श्रम से बनी विरासत को सहेजने का सशक्त प्रयास भी है।