ग्रेटर नोएडा। मानसिक रोगी चाहते हुए भी अपनी तकलीफों के बारे में खुल कर बात नहीं कर पाते और समय के साथ ये बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। ऐसे में ये बेहद ज़रूरी है कि लोगों की इस ग़लत धारणा को बदला जाए और उन्हें इस रोग के बारे में जागरुक किया जाए। यह बातें जीबीयू में चल रहे 51वें राष्ट्रीय वार्षिक चिकित्सा मनोविज्ञान सम्मेलन में विदेश से पहुंचे मनोचिकित्सकों ने कहीं। उन्होंने कहा अब तक हमारे सामने सबसे अधिक समस्या कैलकुलेशन के बाद बेहतर डेटा आने की होती थी,लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आने के बाद कैलकुलेशन करने में काफी मदद मिल रही है। विश्व के आंकड़े भी बेहतर तरीके से उपलब्ध हो रहा है। थाईलैंड के प्रोफेसर सूर्यकांत त्रिपाठी ने बताया कि पूरा विश्व मानसिक स्वस्थ्य से जूझ रहा है। सबसे अधिक अवसाद में युवा जा रहे हैं,जो किसी भी देश का भविष्य है। अवसाद में जाने का ज्रिक वे अपने परिवार और दोस्तों के सामने खुल कर नहीं करते हैं। मानसिक और क्रैक जैसे शब्द हमारे समाज में ऐसी परेशानियों से जूझ रहे लोगों के लिए आम हैं। मानो या न मानो मानसिक बीमारी अभी भी समाज में एक वर्जित विषय है और इसके चारों ओर हमने असंख्य मिथक गढ़ लिए हैं। तनाव और अवसाद का मुकाबला करने वालों की यह लड़ाई मौन और अंधेरी रातों में एक अकेले व्यक्ति की लड़ाई नहीं है। न केवल जीवनशैली में बदलाव और मानसिक चिकित्सा से आप उन लोगों को स्वस्थ जीवन दे सकते हैं जो इस बीमारी से जूझ रहे हैं या बाहर आने में सफल हो पा रहे हैं। बल्कि भविष्य में इस तरह के प्रकरणों को रोक भी सकते हैं। फिर भी, अवसाद के किसी भी लक्षण का पता लगाना महत्वपूर्ण है और एक योग्य चिकित्सा पेशेवर से परामर्श करना उससे भी ज्यादा अहम है। सरकारों को दूसरे देशों के साथ साझेदारी करनी चाहिए। साझेदारी होने से उस देश में मानसिक स्वस्थ्य पर किए जा रहे कामों को करने में तेजी भी आएगी।