छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सीआईएमएस बिलासपुर से एमबीबीएस करने वाले चार डॉक्टरों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार के अनिवार्य सेवा बॉन्ड को स्वतः समाप्त मान लिया है। न्यायालय ने कहा कि नियमों के तहत इंटर्नशिप पूरी होने के छह माह के भीतर नियुक्ति आदेश जारी करना आवश्यक था। सरकार ऐसा करने में विफल रही, जिससे बॉन्ड स्वतः निरस्त हो गया।
इसके परिणामस्वरूप, बाद में जारी किए गए नियुक्ति आदेश प्रभावहीन हो गए। याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने बताया था कि उन्होंने वर्ष 2024 में एमबीबीएस और मई-जून 2025 में इंटर्नशिप पूरी कर ली थी। इसके बावजूद उन्हें निर्धारित समय सीमा में न तो नियुक्ति आदेश मिले और न ही अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया गया। बाद में दिसंबर 2025 में परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से उन्हें बीजापुर और नारायणपुर में पदस्थापना देने की प्रक्रिया शुरू की गई, जिसका डॉक्टरों ने विरोध किया था।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि डॉक्टरों ने सेवा बॉन्ड पर हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने परामर्श प्रक्रिया में भी भाग लिया था, इसलिए उन्हें सेवा देनी चाहिए। वहीं, याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि छह माह की अवधि बीत जाने के बाद नियम के अनुसार बॉन्ड स्वतः समाप्त हो चुका था। इसलिए उन्हें सेवा के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यह प्रशासनिक लापरवाही का मामला था।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने इस मामले पर विचार किया। पीठ ने माना कि नियुक्ति आदेश जारी करने में हुई देरी पूरी तरह से प्रशासनिक थी। इसका खामियाजा डॉक्टरों पर नहीं थोपा जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक बार बॉन्ड समाप्त हो जाने के बाद सरकार डॉक्टरों को सेवा के लिए बाध्य नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त, सरकार 20 से 25 लाख रुपये की बॉन्ड राशि भी वसूल नहीं कर सकती।
न्यायालय ने राज्य सरकार को तत्काल अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय को भी डॉक्टरों को डिग्री प्रदान करने के निर्देश दिए गए हैं। यह फैसला डॉक्टरों के लिए एक बड़ी जीत है। यह प्रशासनिक देरी के कारण छात्रों को होने वाली परेशानी को दूर करेगा।