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अब चिंता आगे के जीवन की है...

Wed, 17 Jul 2013 10:23 AM IST
वेद विलास उनियाल
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17 की शाम जब पुल हिलने लगा, तो हमने अपने घर छोड़ दिए। देखते-ही देखते ही कई घर पिंडर नदी में समा गए। हमारा घर भी नहीं बचा। किसी तरह मंदिर में शरण ली। अब चिंता आगे के जीवन की है। हम सड़क पर आ गए हैं।
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नारायणबगड़ में अकेले बृजमोहन ही नहीं, समूची पिंडरघाटी के लोगों पर इसी तरह का कहर बरपा है। पिंडरघाटी का जीवन माने जाने वाली पिंडर नदी का उफान पूरे क्षेत्र को तहस-नहस कर गया है। यहां कोई सजा-संवरा बाजार तो था नहीं, हां पुराने ढंग की छोटी-छोटी दुकानें जरूर थीं। अब यहां कुछ भी नहीं है।

गांवों का संपर्क टूट गया
संपर्क खत्म हो गए हैं तो पगडंडियां नजर नहीं आती। नारायणबगड़ के शतायु झूला पुल से लेकर थराली, चेपडों और देवाल क्षेत्र में हरमल, ओडर और लिंगड़ी के झूला पुल नदी में समा गए हैं। ऋषि पुल भी खतरे में जद में है।
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इससे नदी के दोनों छोरों पर बसे गांवों का आपस में संपर्क टूट गया है। कुलसारी से नारायणबगड़ पहुंचने में 17 किमी. का रास्ता तय करना पड़ रहा है। सणकोट के लोगों को थराली तहसील पहुंचने में दो दिन का समय लग रहा है।

नारायणबगड़  के एक स्कूल का हाल यह है कि यहां पुल टूटने से साढ़े तीन सौ बच्चों में आधे इस छोर तो आधे उस ओर रह गए हैं। नदी के कटाव ने खेती को बर्बाद कर दिया है। पचासों एकड़ जमीन पानी में समा गई है। पुराना बाजार स्थित श्रीनारायण मंदिर से लगी दो सौ नाली जमीन नदी के एक ही प्रहार में जल में विलीन हो गई।

मींग में खेत बह गए हैं तो कुलसारी में 70 नाली उपजाऊ जमीन का निशां भी नहीं रह गया है। भूस्खलन प्रभावित गांव भ्याड़ी, त्यूंला और छपाली में भी जमीन चटक रही है। अब यहां का आलू, राजमा बाजारों में नहीं दिखेगा। श्रीगुरु पट्टी के झिझोंणी, बमियाला, नलगांव, सिलोड़ी सहित 24 गांवों के रास्ते ध्वस्त हो चुके हैं। स्थिति यह है कि खच्चर भी नहीं जा पा रहे हैं।

प्रशासन का कोई साथ नहीं
विपदा से पिंडरघाटी के छोटे-छोटे व्यवसाय पर बहुत बुरा असर पड़ा है। डा. हरपाल सिंह नेगी कहते हैं कि युवा पूरी तरह टूट गए हैं। प्रदीप सिंह नेगी का कहना है कि प्रशासन का कोई साथ नहीं मिल रहा है। पिछली बार आपदा के बाद महज 120 रुपये मिले थे। इस बार क्या होगा, कुछ पता नहीं।

थराली में बेरोजगारी की जद में आए लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया है। अकेले नारायणबगड़ के पचास परिवार इस एक माह में पलायन कर दिया है।

आवागमन में लोगों को मुश्किलें हो रही हैं। टैक्सी वाले भी मनमाना किराया ले रहे हैं। मोहन सिंह ने बताया कि कुलसारी से नारायणबगड़ के लिए वे पहले 25 रुपये लेते थे। अब 60 रुपये लिए जा रहे हैं।

कुछ जगहों पर बीमार लोगों को कंधे पर बिठाकर फिसलन भरी पंगडंडियों से लाते देखा। हर जगह एक ही आवाज है कि प्रशासन नाम की कहीं कोई चीज नहीं है। शासन क्या होता है यह उन्हें पता नहीं है। भ्याड़ी, छपाली और त्यूंला सहित बेडगांव के लोगों का कहना है कि एक ही उपाय रह गया है कि उनका जल्द से जल्द विस्थापन किया जाए। यहां तो अब न बगीचे मिलेंगे न घर।

डेढ़ सौ साल पुराने मंदिर पर संकट
केवर गांव के प्राचीन शिवालय कमलेश्वर महादेव मंदिर की दीवारें जगह-जगह से चटक गई हैं। यह कभी भी ढह सकता है। यहां सावन के पहले दिन एक भी श्रद्धालु नजर नहीं आया।
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