अस्कोट (पिथौरागढ़)। क्षेत्र की रामलीला 153 वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। वर्ष 1871 में रजवार पुष्कर सिंह पाल ने रामलीला का मंचन शुरू कराया था। इससे पूर्व उन्होंने 32 कलाकारों को प्रशिक्षण के लिए भगवान राम की नगरी अयोध्या भेजा। तीन माह के गहन प्रशिक्षण और रामलीला का साजो सामान लेकर। तब वाद्य यंत्र सारंगी और चिमटा हुआ करते थे।
92 वर्ष के राजेंद्र सिंह पाल ने बताया कि उन्होंने बुजुर्गों से सुना था कि पहली बार सरसों के तेल के दीये और चीड़ के छिलके की रोशनी में रामलीला का मंचन हुआ। बाद में जापान से पेट्रोमैक्स मंगाया गया। इस पेट्रोमैक्स में विशेष किस्म के पत्थर और पानी डाल कर उल्टा लटकाया जाता था। उसके बाद देशी पेट्रोमैक्स की रोशनी में रामलीला हुई। अंतिम रजवार टिकेंद्र बहादुर पाल ने 1965 तक रामलीला कराई। उसके बाद स्थानीय लोगों ने कमेटी बनाकर रामलीला का मंचन किया। वर्ष 1974 में बिजली की चकाचौंध में रामलीला होने लगी।
अस्कोट के राना गैर नामक स्थान में मंचन होता था। वर्तमान में यहां आईटीआई है। 89 वर्ष के पुरुषोत्तम उपाध्याय बताते हैं कि समय के साथ रामलीला के मंचन में भी आधुनिकता का प्रवेश हो गया है। बावजूद इसके स्थानीय लोगों ने रामलीला के अस्तित्व को बनाए रखा है। कमेटी अध्यक्ष होशियार सिंह पाल ने बताया कि पात्रों का प्रशिक्षण जारी है।
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यज्ञ के रूप में मनाते थे रामलीला
अस्कोट। पहले रामलीला 20 से 22 दिन तक होती थी जिसे यज्ञ के रूप में मनाया जाता था। कलाकारों को एक माह पूर्व से सादा भोजन और ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था। पारायण के बाद प्रसाद वितरण के साथ रामलीला का समापन होता था। हवन में लोग तिल, जौ, घी अन्य सामग्री लेकर पहुंचते थे। संवाद
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रामलीला देखने दूरदराज से पहुंचते थे लोग
अस्कोट। क्षेत्र की प्रसिद्ध रामलीला को देखने के लिए पहले लोग धारचूला, मुनस्यारी, मदकोट, बरम, जौलजीबी, नेपाल, कनालीछीना, दिगतड़, सिंगाली, गर्खा, गर्जिया,चमलेख आदि स्थानों से आते थे। संवाद