मिलिए ‘निमकी मुखिया’ से! एक बेहद चुलबुली लड़की ...और बातूनी भी । निमकी मुखिया यानी भूमिका गुरंग शुक्रवार को ‘अमर उजाला’ के चांदपुर स्थित कार्यालय पहुंचीं। बेबाक निमकी ने खूब बातें कीं। एक खास बात यह कि निमकी को नमकीन कहने पर कोई एतराज नहीं।
जब पूछा गया- जलेबी बाई... तो पूरे कमरे में ठहाके की गूंज सुनाई पड़ी। हमारे संपादकीय साथियों से मिलीं भूमिका और दिल्ली रवाना हो गईं। नारी सशक्तिकरण पर आधारित ये धारावाहिक टीवी चैनल स्टार भारत पर शुरू हुआ है।
‘बालिका बधू’, ‘न आना इस देश लाडो’ जैसे संदेशपरक धारावाहिकों के बाद छोटे परदे पर प्रसारित हो रहे ‘निमकी मुखिया’ सीरियल अलग तरह के कंटेट के कारण इन दिनों सबकी जुबां पर है। अमर उजाला से खास बातचीत में सीरियल की कहानी के साथ-साथ भूमिका ने अपने अनुभव पर विस्तार से बातचीत की। दावा किया, चाहे लड़कियों की पढ़ाई की चिंता हो या महिलाओं के राजनीति में आने की या फिर समानता की, इस धारावाहिक के जरिए महिलाओं को अधिकारों के प्रति जागरूक करने में मदद मिलेगी।
यह पूछने पर कि क्या इस लीड रोल के वास्तविक नाम नमकीन कुमारी के पहले शब्द को कहने पर उन्हें अटपटा तो नहीं लगता है। ठहाके लगाते हुए बिंदास अंदाज में बोलीं- इसमें कुछ भी तो गलत नहीं है। कोई उन्हें इस नाम से बुलाए तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।
मूलत: शिमला की रहने वाली, दिल्ली में जन्मी और पढ़ी-लिखी भूमिका गुरंग के पिता मुंबई में कारोबारी हैं। भूमिका ने कभी थिएटर नहीं किया। बावजूद इसके 16 साल की उम्र में ही तय कर लिया था कि टीवी के लिए काम करना है। दो-तीन साल लगातार ऑडिशन देने वाली भूमिका ने ‘निमकी मुखिया’ में काम पिछले साल शुरू किया था।
भूमिका कहती हैं कि निमकी का किरदार निभाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। बिहार की ठेठ लड़की के किरदार के लिए मुझे कई वर्कशाप अटेंड करनी पड़ी। लगातार प्रैक्टिस की तब जाकर कहीं बिहारी टोन मेरे अंदर से बाहर आई। टीवी पर जब खुद को इस किरदार में देखा तो विश्वास ही नहीं हुआ।
अब लगता है कि मेरी असली भाषा यही है। मुझे खुशी है कि लोगों को मेरी भाषा पसंद आ रही है। अब तो जब भी निमकी के किरदार में होती हूं तो भूल जाती हूं कि मैं कोई भूमिका हूं, इसलिए उसका जो पागलपन है और उसकी भाषा है वह मुझमें घुस जाती है।
भूमिका कहती हैं-‘निमकी मुखिया’ में महिला सशक्तिकरण से लेकर स्वच्छता अभियान की भी झलक मिलेगी। हालांकि वह मानती हैं कि निमकी के चरित्र की तरह वह रियल लाइफ में ओवर कांफिडेंट नहीं हैं। हालांकि सोशल लाइफ में इससे कहीं ज्यादा एक्टिव हैं।
यह पूछने पर कि क्या सीरियल और फिल्म के लिए ट्रेनिंग जरूरी है, कहती हैं कि बिल्कुल, इसके बगैर आप अच्छे कलाकार नहीं हो सकते हैं। संवाद में उतार-चढ़ाव और अंदाज बिना प्रशिक्षण लिए नहीं सीखा जा सकता है। कहती हैं- अगर कोई पिता से कहे कि बेटे के अंदाज में बात करें तो यह तब तक संभव नहीं होगा, जब तक आप उस कैरेक्टर को अपने अंदर नहीं उतारेंगे। ये कैसे करना है, ट्रेनिंग से ही जाना जा सकता है।
छोटे-बड़े पर्दे पर किस्मत आजमाने की चाहत रखने वालों को उनकी सलाह है कि नए निर्माता, नए निर्देशक नए नजरिए से नई कहानियां लिख रहे हैं। जाहिर है कि इसमें नए चेहरों के लिए भी गुंजाइश ज्यादा है। उनके लिए काम भी ज्यादा होगा और वे अधिक प्रभावी भी होंगे।