इसके बाद कुमार विश्वास ने इस 'करुणा कलित हृदय में, अविकल रागिनी बजती है' को भी सुनाया। इससे पहले कार्यक्रम के शुभारंभ में आजादी के अमृत महोत्सव के तहत होने वाले कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया गया। कार्यक्रम में प्रदेश के पर्यटन मंत्री डॉ.नीलकंठ तिवारी, रोहित सिंह, अतिरिक्त सचिव संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के साथ ही पद्मश्री पंडित राजेश्वर आचार्य, सच्चिदानंज जोशी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर का सभागार
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कुमार विश्वास ने अपने कार्यक्रम के बीच-बीच में काशी की खासियत को भी बताया। कहा कि काशी में पूरा विदेश देखता है। यहां पता नहीं क्यों लोग केवल यहां सड़कों को देखते हैं। काशी को देखना है तो यहां की गलियों को देखना होगा। गलियों से ही देखने पर इसकी खासियत का पता चलता है।
बनारस में कुछ भी कहा जाए, यह कम होता है। यहां मंच पर आने के लिए मंत्री होना जरूरी नहीं है। कला की पहचान होती है। यह वही काशी है, जहां का मरना भी मंगल होता है। ऐसी काशी बहुत नसीब वालों को मिलती है। काशी में मराठी भाषियों का भी बहुत जुड़ाव रहा है। कवि सुब्रमहणयम भारती ने यहीं चार साल तक प्रवास किया है।
केंद्रीय संस्कृति राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी ने अपने भाषण की शुरूआत भोजपुरी से की। कहा कि इहा सभागार में उपस्थित सब लोगन के गोड़ लागत बाड़ी। प्रणाम बाड़ी। हर हर महादेव के जयघोष से भी गूंज उठा। अन्नपूर्णा देवी की भी जयकारे लगे।
मीनाक्षी लेखी ने कहा कि काशी नगरी का जो उत्सव मनाया जा रहा है, वह अविस्मरणीय है। काशी का जीवन ऐसा है जिसने लोक संगीत, वेदों पर टिप्पणी, ज्ञान विज्ञान यंत्र पर सब पर काम हुआ है। काशी में तीन दिवसीय उत्सव का उद्देश्य लोगों को समृद्ध विरासत से अवगत कराना है।
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संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से तीन दिवसीय काशी उत्सव का आगाज मंगलवार को रूद्राक्ष कनवेंशन सेंटर में किया गया। इस मौके पर पुस्तक विमोचन के अलावा साहित्यकारों की कृतियों पर चर्चा हुई। भारतीय स्वतन्त्रता के 75वें वर्ष में अमृत महोत्सव का विविध यात्राओं के साथ भारत की सांस्कृतिक राजधानी में काशी उत्सव में आयोजित किया गया।
आयोजन के प्रथम सत्र में प्रो. मारुति नन्दन प्रसाद तिवारी की पुस्तक काशी की प्राचीन देवमूर्तियां विमोचन हुआ। इस मौके पर काशी के हस्ताक्षर भारतेन्दु हरिश्चंद्र एवं जयशंकर प्रसाद का हिंदी साहित्य को अवदान, राष्ट्रवाद की संकल्पना विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया।
परिचर्चा में वीरेन्द्र मिश्र ने कहा कि काशी की होली भी मसाने की होती है और दीपावली भी देवों की ही होती है। प्रोफेसर निरंजन कुमार ने कहा कि भक्ति में डूबी तुलसी की काशी है, जो कबीर की फक्कड़ता में जीवन जीती है। सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि काशी के प्रत्येक रंग का, इसकी अभूतपूर्व कला साधना से युवा के मस्तिष्क में उनकी मौलिकता से परिचय कराना आयोजन का लक्ष्य है।