उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों-जनजातियों और पिछड़े वर्ग को जारी आरक्षण व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने सवाल खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार को बताने के लिए कहा है कि सरकार ने आरक्षण अधिनियम लागू करते समय यह कैसे तय कर लिया कि आरक्षित जातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।
कोर्ट ने आरक्षण अधिनियम में परिभाषित जातियों का सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व का आंकड़ा भी मांगा है। कोमल सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति वीके शुक्ल और न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की खंडपीठ ने सुनवाई के लिए 14 फरवरी 2014 की तिथि नियत की है।
उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लागू आरक्षण के औचित्य और तरीके दोनों पर सवाल खड़े किए गए हैं।
अधिवक्ता अनिल सिंह बिसेन और अग्निहोत्री कुमार त्रिपाठी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत राज्य सरकार को उन पिछड़ी जातियों को आरक्षण में शामिल करने की शक्ति प्राप्त है जिनका कि सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
मगर सरकार ने यूपी एक्ट 4 (1974) लागू करते समय पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में प्राप्त प्रतिनिधित्व की कोई जानकारी नहीं जुटाई। सरकार के पास मौजूदा समय में भी ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है जिससे पता चल सके कि किन को कितना प्रतिनिधित्व प्राप्त है।
एम नागराज केस में सुप्रीमकोर्ट ने भी कहा है कि प्रतिनिधित्व का आंकड़ा जाने बिना आरक्षण जारी नहीं रखा जा सकता है। सर्वोच्च अदालत ने इसी आधार पर प्रोन्नति में आरक्षण को रद कर दिया था। खंडपीठ ने प्रदेश सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह की मोहलत दी है।