कोरोना महामारी की तीसरी लहर को लेकर चेतावनी जारी हो चुकी है, मगर कुपोषित बच्चों की स्थिति स्पष्ट नहीं है। दो साल से कुपोषित बच्चों को चिह्नित करने के लिए सर्वे ही नहीं हुआ है। ऐसे में पुराने आंकड़ों के आधार पर ही योजनाएं संचालित की जा रही हैं। जिम्मेदारों की लापरवाही से कुपोषण के खिलाफ चल रहे अभियान पर सवाल उठने लगे हैं।
तीसरी लहर में बच्चों को अधिक खतरा बताया जा रहा है। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने तैयारी शुरू कर दी है। अस्पताल में अलग-अलग वार्ड तैयार किए जा रहे हैं। कुपोषित बच्चों के लिए कोई योजना नहीं है। जबकि इनमें कोरोना से लड़ने की क्षमता न के बराबर है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के पास कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों का आकड़ा भी पुराना ही है। कुपोषित बच्चों की स्थिति जानने के लिए हर वर्ष दो बार अप्रैल और नवबंर में सर्वे कराया जाता है, मगर इस बार कोरोना के चलते सर्वे नहीं हो सका।
आशा बहुओं के साथ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की ड्यूटी कोरोना संक्रमितों को ढूंढने में लगा दी गई। ऐसे में कुपोषित बच्चों को चिह्नित नहीं किया जा सका। स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के मुताबिक, सितंबर 2019 में हुए सर्वे में जिले में 18472 बच्चे अतिकुपोषित मिले थे। 26911 बच्चे कुपोषित पाए गए थे। कोरोना काल में 287 बच्चे जन्म लेते ही अतिकुपोषित मिले थे। वहीं 467 बच्चे कुपोषित पाए गए थे।
ये वे आंकड़े हैं जब जन्म लेने के बाद नवजातों का वजन किया जाता है। ऐसे में तीसरी लहर में कुपोषित बच्चों को कोरोना से बचा पाना स्वास्थ्य विभाग के साथ जिला प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर होगा। दरअसल, स्वास्थ्य विभाग के साथ प्रशासन के पास ऐसा कोई आकड़ा नहीं है जिससे पता चल सके कि जिले में वर्तमान समय में कितने कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चे हैं।
कुपोषित के साथ अतिकुपोषित बच्चों को भर्ती कर इलाज करने के लिए कुपोषण पुनर्वास केंद्र बना हुआ है, मगर इन दिनों एक भी बच्चे नहीं हैं। बच्चे आएंगे तो भर्ती कर इलाज किया जाएगा। कोरोना की तीसरी लहर में कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों को ज्यादा खतरा है। इसलिए कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों का ब्यौरा प्रशासन से मांगा गया है। डॉक्टर आर्य देशदीपक, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज