अंग्रेजों को टैक्स और मालगुजारी देने से किया था इंकार
बुढ़ाना। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बुढ़ाना क्षेत्र के रणबांकु़रे भी पीछे नहीं रहे। तहसील के गांव परासौली के जमींदार खैराती खां ने अंग्रेजों का विरोध करते हुए टैक्स और मालगुजारी देने से इंकार कर अंग्रेजों को खदेड़ दिया था। आजादी की लड़ाई में खैराती खां के योगदान को भी कभी नहीं भुलाया जा सकता।
मेरठ में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आगाज होने के बाद आसपास के जनपदों में तेजी से क्रांति का सूत्रपात हुआ। इसी क्रम में जनपद मुजफ्फरनगर के बाशिंदों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह तेज कर दिया था। स्वतंत्रता संग्राम में बुढ़ाना तहसील क्षेत्र भी पीछे नहीं रहा। उस समय हैदराबाद रियासत से गांव परासौली आए नवाब खैराती खां की यहां रियासत थी। नवाब खैराती खां अपने पिता बादल बेग और माता के साथ गांव परासौली आए थे। यही पर उन्हें एक बेटा पैदा हुआ था। जिसका नाम हमीदुदीन उर्फ मीदू रखा गया था।
इसी दौरान स्वतंत्रता की आग की लपटे बुढ़ाना तहसील क्षेत्र तक पहुंच गई। जमींदार खैराती खां के नेतृत्व में लोगों ने विद्रोह कर दिया था। खैराती खां ने सरकारी देय और मालगुजारी देने से इंकार करते हुए अंग्रेजों को खदेड़ दिया था। इसका असर यह हुआ कि खैराती खां और जौला गांव के मीर पठान के नेतृत्व में भारी संख्या में क्षेत्र के लोगों ने तहसील पर कब्जा कर लिया था। जिसके कारण अंग्रेजों को भागना पड़ा था।
छीन लिए थे अंग्रेजों के घोड़े
परासौली गांव में विद्रोह की खबर पाकर अंग्रेज अधिकारियों ने पुलिस और घुड़सवार सैनिकों को विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा था। इस दौरान युद्ध हुआ और क्षेत्र के लोगों ने अंग्रेज सैनिकों के घोड़े तक छीन लिए थे। गांव वालों के देशभक्ति के जज्बे को देखकर परासौली से फिरंगियों के पीठ दिखाकर भागने को मजबूर होना पड़ा था।
तहसील पर कर लिया था कब्जा
परासौली गांव से सरकारी अमले को भगाने के बाद खैराती खां और जौला गांव के मीर खां पठान के नेतृत्व में क्षेत्र के लोगों ने हमला कर बुढ़ाना तहसील पर कब्जा कर लिया था। अचानक हुए हमले के कारण फिरंगियों को विरोध करने का भी मौका नहीं मिला था। गांव जसाला के गुर्जरों ने भी इस हमले में पूरा साथ दिया था। तहसील पर ग्रामीणों द्वारा कब्जा कर लेने की सूचना से जनपद में अंग्रेजों के होश उड़ गए थे।
तहसीलदार ने शाहपुर में छिपकर बचाई थी जान
बुढ़ाना। तहसील पर अचानक ग्रामीणों द्वारा किए गए हमले के दौरान तहसीलदार बुढ़ाना भाग खड़ा हुआ था। उसने शाहपुर में नियामत इलाही खां पठान के घर छिपकर जान बचाई थी। उस वक्त शाहपुर के पठान ने एक अंग्रेज युवती को भी अपने यहां शरण देकर अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी दिखाई थी।
परासौली गांव में खैराती खां की इमारत का मुख्य द्वार व हाथीखाना का स्थान दिखाते ग्रामीण हाजी कमरू?- फोटो : MUZAFFARNAGAR