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चौंकाने वाला खुलासा: एचआईवी और हेपेटाइटिस बी व सी के चक्रव्यूह में फंस गए 501 युवा, ऐसे हुई पहचान

Fri, 08 Oct 2021 06:38 PM IST
कपिल kapil अरीश रिजवी, अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ

सार

मेरठ के युवाओं को पता नहीं चला और वे एचआईवी और हेपेटाइटिस बी व सी के चक्रव्यूह में फंस गए। सरकारी अस्पतालों के कैंपों और किसी अपने के लिए किए गए रक्तदान की आई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
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सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
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मेरठ में युवाओं को पता ही नहीं चला और वे एचआईवी और हेपेटाइटिस बी व सी के चक्रव्यूह में फंस गए। सरकारी अस्पतालों के कैंपों और किसी अपने के लिए किए गए रक्तदान की रिपोर्ट आई तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। जिला अस्पताल और मेडिकल में इस वर्ष नौ माह के दौरान 501 रक्तदान करने वाले हेपेटाइटिस सी और बी के शिकार निकले हैं। इनमें अधिकांश 20 से 45 वर्ष की आयु वर्ग के बीच हैं। 

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मेडिकल के ब्लड बैंक में एक जनवरी 2021 से 30 सितंबर 2021 तक 380 रक्तदाता बीमार मिले हैं। इनमें 21 एचआईवी पॉजिटिव थे। 183 हेपेटाइटिस सी और 176 हेपेटाइटिस बी से पीड़ित पाए गए। वहीं, जिला अस्पताल के ब्लड बैंक की रिपोर्ट में 10 लोग एचआईवी पॉजिटिव, 45 हेपेटाइटिस सी और 66 हेपेटाइटिस बी से पीड़ित निकले। इन दोनों ब्लड बैंकों में इस दौरान 13271 (जिला अस्पताल 7200 और मेडिकल कॉलेज 6071) यूनिट रक्तदान किया गया। जांच के बाद बीमार लोगों का खून नष्ट कर दिया गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इन लोगों से संपर्क किया और इलाज शुरू कराया है।
 
समय पर इलाज से ठीक हो सकता है हेपेटाइटिस-सी
मेडिकल कॉलेज की ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. प्रीति सिंह ने बताया कि हेपेटाइटिस सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है और यकृत को प्रभावित करता है। यह वायरस रक्त से रक्त के संपर्क द्वारा फैलता है। इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है। इस बीमारी का पता शुरू में नहीं लग पाता। इस कारण यह जानलेवा हो जाती है। मेडिकल कॉलेज में इसका इलाज निशुल्क किया जा रहा है।
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जानलेवा है हेपेटाइटिस-बी
जिला अस्पताल के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. कौशलेंद्र सिंह ने बताया कि हेपेटाइटिस बी (यकृतशोथ बी) एक संक्रामक बीमारी है। इसके कारण लीवर की सूजन और जलन पैदा होती है। इसके वायरस का संचरण संक्रमित रक्त या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में जाने से होता है। इसका इलाज वायरस रोधी दवाओं से किया जाता है। ये दवाएं खून में वायरस की मात्रा घटा सकती हैं या उन्हें हटा सकती हैं, जिससे लीवर सिरोसिस या लीवर कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है।

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21 युवा मिले एचआईवी पॉजिटिव 
मेडिकल के एंटी रिट्रो वायरल ट्रीटमेंट (एआरटी) सेंटर के प्रभारी डॉ. तुंगवीर सिंह आर्य ने बताया कि एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनो डिफिशिएंसी वायरस) एक ऐसा वायरस है, जिसकी वजह से एड्स होता है। यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है। जिस इंसान में इस वायरस की मौजूदगी होती है, उसे एचआईवी पॉजिटिव कहते हैं। आमतौर पर लोग एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब ही एड्स समझने लगते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। एचआईवी के शरीर में दाखिल होने के बाद शरीर की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है और शरीर पर तरह तरह की बीमारियां और इंफेक्शन पैदा करने वाले वायरस अटैक करने लगते हैं। एचआईवी पॉजिटिव होने के करीब 8-10 साल बाद इन तमाम बीमारियों के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं। इस स्थिति को ही एड्स कहा जाता है। वैसे, एचआईवी पॉजिटिव होने के बाद से एड्स होने तक के अंतराल को दवाओं की मदद से बढ़ाया जा सकता है और कुछ बीमारियों को ठीक भी किया जा सकता है। एआरटी सेंटर में इनका इलाज किया जाता है। 

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इन कारणों से होती हैं बीमारियां 
- दूषित सिरिंज का उपयोग करना।
- दूषित रेजर या टूथब्रश का इस्तेमाल।
- दूषित रक्तदान, अंगदान या लंबे समय तक डायलिसिस द्वारा।
- दूषित सुईं से टैटू बनवाना या एक्यूपंचर करवाना।
- असुरक्षित यौन संबंध।

सतर्क रहें तो नहीं है खतरा 
इंजेक्शन से नशीली दवाओं का प्रयोग करना एचआईवी संक्रमण का सबसे आम रास्ता है। कोई भी ऐसा कार्य या गतिविधि जिसमें खून से खून का संपर्क होने की संभावना है, संक्रमण का संभावित स्रोत हो सकता है। अगर सावधानी बरतें, तो इन बीमारियों से बचे रह सकते हैं।
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