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टाउन हॉल में होती थी गुप्त बैठकें, 40 स्वतंत्रता सैनानी गए थे जेल

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नगर पालिका स्थित टाउन हॉल। - फोटो : HAPUR
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टाउन हॉल में होती थी गुप्त बैठकें, 40 स्वतंत्रता सैनानी गए थे जेल
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हापुड़। आजादी की लड़ाई में हापुड़ के स्वतंत्रता सैनानियों का बड़ा योगदान रहा है। अंग्रेजों से लड़ते हुए जहां कई शहीद हो गए, वहीं 40 से अधिक स्वतंत्रता सैनानियों को कई बार जेल जाना पड़ा। हापुड़ पश्चिम की आंदोलन रणनीति का बड़ा केंद्र हुआ करता था। इस दौरान नगर पालिका हापुड़ के टाउन हाल में क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकें हुआ करती थीं और महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे। 1942 की अगस्त क्रांति आंदोलन की लड़ाई में विशेष रही थी। इस संबंध में हाल ही में एक सर्वे भी किया गया है।
वर्ष 1857 से क्षेत्र के लोगों में सुलगी ज्वाला आजादी मिलने तक सुलगती रही। वर्ष 1947 से पहले कुछ वर्षों में आजादी की यह ज्वाला लावा बन चुकी है। क्षेत्र के लोगों ने आजादी की इस लड़ाई में क्षेत्र के लोगों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था और जंगे आजादी में अपनी आहुति दी थी। हापुड़ क्षेत्र उस समय पश्चिम की जंग का विशेष केंद्र था।
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सर्वे में रोचक तथ्य आए सामने
हाल ही में गुरुकल ततारपुर के शिक्षकों ने जिले की आजादी की महत्ता के संबंध में एक सर्वे किया। जिसमें कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं। आजादी से वक्त को करीब से जानने वाले कितने ही लोगों से आचार्य कुशल देव की टीम ने बताया कि इस संबंध में उनके द्वारा विभिन्न गांवों के सौ से अधिक लोगों से बात की गई। उन्होंने बताया कि उस समय नगर पालिका का टाउन हाल क्रांतिकारियों की गुप्त मंत्रणा का स्थान होता था। यहां रात के अंधेरे में अंग्रेजों से छिपकर बैठकें हुआ करती थीं। यहां बनने वाली रणनीतियों के कारण ही 1947 में देश आजाद हो सका। हापुड़ क्षेत्र से 40 से अधिक क्रांतिकारियों के नाम प्रकाश में आए हैं, जिन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश की आजादी के लिए कई बार जेल गए।
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अगस्त क्रांति को भुलाया नहीं जा सकता-
हापुड़ में 11 अगस्त 1942 को लोगों के एक जुलूस पर अंग्रेजी हुकूमत ने गोलियां चलवा दी थी। एक अगस्त को लोकमान्य तिलक की प्रथम पुण्यतिथि पर लोग सड़कों पर उतरे थे और इसके बाद लोग प्रतिदिन जुलूस के रूप में सड़कों पर उतर आते। 11 अगस्त की सुबह लाला परमानंद, अमोलक चंद, रत्नलाल गर्ग, बाबू मुरारीलाल तबले वाले, खलीफा मंजूर हसन को गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके विरोध में एक बार फिर लोग जुलूस के रूप में सड़कों पर उतर आए। जिस पर अंग्रेजी हुकूमत ने गोलियां चलवा दी थी। जिसमें रामस्वरूप जाटव, अगनलाल शर्मा, गिरधारी लाल और मांगे राम को गोली लगी। शहीदों के बारे में पता चलते ही पूरे क्षेत्र में आक्रोष फैल गया था। यह घटना आजादी के लिए युवाओं के लिए प्रेरणादायक रही और कितने ही युवा इस लड़ाई में कूद गए। इसके बाद अंग्रेजी सरकार के पैर उखड़ने शुरू हो गए थे।
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