ग्रामीण क्षेत्रों में बकरा, मुर्गा काटने तथा उसका मीट बेचने के लिए जिला पंचायत से लाइसेंस लेने का प्रावधान पहले भी था, पर लेता कोई नहीं था। शासन की सख्ती के बाद अब लाइसेंस लेने के लिए सैकड़ों ने आवेदन किया है। विभाग संबंधित स्थानों की जांच कराने के बाद लाइसेंस जारी करेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में बकरा, मुर्गा, मछली और अंडा बेचने के लिए जिला पंचायत से लाइसेंस लेना अनिवार्य है। यह व्यवस्था पहले भी थी पर उसका लाइसेंस कोई नहीं लेता था। जिला पंचायत के फील्ड कर्मचारी कभी खानापूरी के लिए किसी के नाम की रसीद काट देते थे। इधर, भाजपा की सरकार आने के बाद अवैध बूचड़खानों पर जब सख्ती हुई तो अवैध रूप से बकरा, मुर्गा काटने और बेचने पर प्रतिबंध हो गया। इस कारोबार में लगे लोगों ने जब विरोध किया तथा न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो शासन की तरफ से कहा गया कि कहीं कोई प्रतिबंध नहीं है। जो लोग अवैध रूप से कारोबार करते हैं उन्हीं के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। प्रशासन की तरफ से कहा गया कि शहरी क्षेत्र में नगर निगम तथा ग्रामीण क्षेत्र में जिला पंचायत से लाइसेंस लेकर कोई भी कारोबार कर सकता है। फिर क्या आवेदन की भरमार हो गई।
किस तरह के हैं आवेदन
उरुवा ब्लॉक के हरिलालपुर निवासी जब्बार अली ने अपर मुख्य अधिकारी को दिए आवेदन में कहा है कि बकरा, मुर्गा खरीदकर काटने और बेचने का उनका जातिगत पेशा है। इस नाते उन्हें उस स्थान पर बकरा काटने बेचने का लाइसेंस देने की अनुमति प्रदान करें।
लाइसेंस का क्या है प्रावधान
जहां पर बकरा काटा जाएगा, वह स्थान आबादी से 100 मीटर दूर होगा। काटने के बाद उसके शरीर से निकले कचरे को तीन मीटर गड्ढे में ढंकना होगा। उसके लिए जगह होनी चाहिए। काटने से पहले बकरे की पशु चिकित्सक से जांच होनी चाहिए कि बकरा स्वस्थ है कि नहीं। मीट को ढंककर रखना होगा। खुले में नहीं बेच सकते हैं। काटने की लाइसेंस फीस 400 रुपये है। जबकि बेचने की फीस दो सौ रुपये सालाना है।
मछली, अंडा बेचने का बनता है लाइसेंस
मछली और अंडा बेचने के लिए भी इस कारोबार में लगे लोगों को लाइसेंस लेना अनिवार्य है। मछली के लिए लाइसेंस शुल्क 100 रुपये है जबकि अंडे का 50 रुपये है। दुकानों की जांच जिला पंचायत की ओर से की जानी है।