कमालगंज (फर्रुखाबाद)। मुठभेड़ों में 50 से अधिक आतंकियों को ढेर कर चुके हवलदार आलोक दुबे को सोमवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शौर्य चक्र से सम्मानित किया है। राष्ट्रपति भवन में मिले सम्मान से सैनिक के आलोक के गांव भटपुरा और आसपास के गांवों में आतिशबाजी छुड़ाने के साथ मिठाई बांटी गई।
हवलदार आलोक दुबे 23वीं बटालियन दि राजपूत रेजीमेंट सिक्किम में तैनात हैं। इसके पहले वह जम्मू-कश्मीर में तैनात थे। 22 जून 2019 को जम्मू-कश्मीर सोपिया जिले के जंगलों में मेजर विकास की अगुवाई में सेना की टुकड़ी ने आतंकियों की तलाश में अभियान चलाया था। इसमें हवलदार आलोक ने घेराबंदी में रणनीतिक सूझबूझ से कंपनी कमांडर की उल्लेखनीय मदद की। सुबह पौने छह बजे आतंकवादी ने कम रोशनी व झाड़ियों का फायदा उठाकर हथगोला व अंधाधुंध गोलीबारी कर भागने की कोशिश की।
हवलदार आलोक ने नजदीकी लड़ाई में एक आतंकवादी को मार गिराया। उसकी पहचान ए प्लस श्रेणी आतंकवादी के रूप में हुई। इसके बाद आलोक रेंगते हुए आगे बढ़े और अपनी ओर की घेराबंदी मजबूत कर आतंकियों निकलने का रास्ता बंद कर दिया। जिससे चार अन्य खूंखार आतंकी भी मार गिराए गए थे। उनकी इसी सूझबूझ, साहस व पहल के लिए राष्ट्रपति ने शौर्य चक्र दिया है।
अलंकरण कार्यक्रम में पत्नी पूजा दुबे व भाई आदेश दुबे भी मौजूद रहे। हवलदार आलोक 15 से अधिक अभियानों में करीब 50 आतंकियों को ढेर कर चुके हैं। आतंकियों के खिलाफ आपरेशनों में उन्हें कमांड एंड कंट्रोल में महारत हासिल है। भाई विवेक दुबे ने बताया कि आलोक 25 नवंबर को गांव आएंगे। ग्रामीण उनके स्वागत की तैयारी कर रहे हैं।
शाम को रक्षा मंत्री के साथ किया डिनर
शौर्य चक्र विजेता आलोक दुबे ने फोन पर बताया कि शाम को रक्षा मंत्री के साथ उन्होंने डिनर किया। आलोक ने बताया कि बचपन में ही देश की रक्षा का संकल्प ले लिया था। आरपी इंटर कालेज में स्काउट्स कार्यक्रमों भाग लिया फिर 12 यूपी बटालियन से 2001 में एनसीसी किया। दौड़ लगाने गांव भटपुरा से फतेहगढ़ व रजीपुर-खुदागंज तक जाते थे। 30 जनवरी 2002 को फर्रुखाबाद में राजपूत रेजिमेंट फतेहगढ़ में भर्ती हुए थे। कहा अब युवाओं को भर्ती के लिए बरेली व आगरा जाना पड़ता है, यह कष्टदायक है। फतेहगढ़ में ही ओपन भर्ती होनी चाहिए।
गांव के प्यारेलाल ने लड़ीं 1965 व 1971 की जंग
आलोक को शौर्य चक्र मिलने पर भटपुरा व आसपास के अन्य गांवों में खुशी का माहौल है। भटपुरा देश रक्षा के लिए शौर्य गाथाओं को समेटे है। गांव के प्यारेलाल दुबे ने 1965 व 1971 की जंग लड़ी थी। रिटायर होने के बाद वह जवानों के युद्ध कौशल की कहानियां युवाओं को सुनाया करते थे।
बेटे के शौर्य पर मां की आंखों में भरी चमक
आलोक की 65 वर्षीय मां आशा दुबे गांव में रहती हैं। बेटे को शौर्य चक्र मिलने की फोटो परिजनों ने मोबाइल पर दिखाईं तो उनकी आंखें चमक उठीं। उन्होंने मोबाइल पर फोटो को चूम कर बेटे को आशीर्वाद दिया। बताया कि आलोक पांच बेटों में सबसे बड़ा है। आलोक की पत्नी पूजा और बच्चे मसेनी के पास रहते हैं। बेटा सूर्यांश, बेटी सुहानी व शिवांगी आर्मी पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। पिछले साल पिता संतोष कुमार का निधन हो गया था। तब व जम्मू कश्मीर में तैनात थे। रास्ते में देर होने पर पिता के अंतिम दर्शन नहीं कर सके थे। ड्यूटी पर वापस जाते समय रास्ते में शौर्य चक्र के लिए चुने जाने की जानकारी हुई थी।
पत्नी और भाई आदेश के साथ हवलदार आलोक दुबे। संवाद- फोटो : FARRUKHABAD