16 में से 12 ब्लॉक डार्कजोन में, 200 फुट से नीचे गिरा भूजल स्तर
बुलंदशहर। पानी का अत्यंत दोहन होने से जनपद का भू-गर्भ जल स्तर 200 फीट से नीचे चला गया है। स्थिति यह है कि 16 ब्लॉकों में से 12 ब्लॉक डार्कजोन में शामिल हो गए हैं। अब सिर्फ चार ब्लॉक ही सुरक्षित बचे हैं। इसके बाद भी जिले में जल संचयन के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं दिख रहे हैं।
बुलंदशहर जिला प्रदेश के कृषि प्रधान जनपदों में शामिल है। यहां के एक छोर से होकर गंगा नदी गुजरती है। यहां पर हर तरह की फसल उगाई जाती है। 4.50 लाख हेक्टेयर में से 3.65 लाख हेक्टेयर में खेती की जाती है। इससे करीब चार लाख किसान जुड़े हुए हैं। पानी की सभी को जरूरत होती है। लेकिन यहां पर पिछले करीब तीन दशक से लगातार पानी कम होता जा रहा है।
ये ब्लॉक हैं डार्कजोन में
हाल ही में जारी की गई सूची में बुलंदशहर, पहासू, स्याना, ऊंचागांव, खुर्जा, शिकापुर, पहासू, अरनिया, गुलावठी, दानपुर, ऊंचागांव और स्याना डार्कजोन में हैं। जबकि अनूपशहर, डिबाई, बीबीनगर और अगौता ब्लॉक ही सुरक्षित बचे हैं।
नहर और नदी की स्थिति
खास बात यह है कि डिबाई, स्याना और ऊंचागांव क्षेत्र से गंगा होकर गुजरती है। तराई इलाकों में भू-गर्भ का जलस्तर घटना चिंता का विषय है। बुलंदशहर और पहासू क्षेत्र में दो-दो गंगा कैनाल और काली नदी गुजर रही हैं। इसके बावजूद बुलंदशहर भू-गर्भ का जल स्तर डार्क जोन में पहुंच गया है। वहीं, दूसरी ओर जिले में रजवाहों का जाल बिछा हुआ है। इनमें से अधिक रजवाहे ऐसे हैं, जिनमें अभी तक पानी नहीं पहुंचा है।
प्रतिबंधित हैं नलकूप और सबमर्सिबल
डार्क ब्लाकों में नलकूप और सबमर्सिबल लगाने पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद हर रोज इन ब्लाकों में सबमर्सिबल लगाने के लिए बोरिंग किए जा रहे हैं। कृषि प्रोग्राम के तहत इन ब्लाकों में कम सिंचाई वाली फसलों को प्रोत्साहित करना था लेकिन इसके लिए भी कोई पहल नहीं हुई।
यह भी हैं कारण
तिलहन और दहलन का रकबा सिमट गया और धान की खेती का दायरा बढ़ गया। बता दें कि धान को अधिक पानी और दलहन तिलहन की फसलों को कम सिंचाई की जरूरत होती है। निजी और सरकारी भवनों पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगने थे। लेकिन यह भी बेमानी ही साबित हुए। अभी तक 70 हार्वेस्टिंग सिस्टम ही लगे हैं। इनकी हालत ठीक नहीं है और बरसाती पानी का संचयन नहीं हो रहा है। हर वर्ष तालाबों की सफाई पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। बावजूद इसके तालाब साफ होना तो दूर की बात एक भी तालाब ऐसा नहीं है, जिससे पानी का संचयन किया जा सके।
कुओं का मिट चुका है अस्तित्व
जिले में कभी जगह-जगह कुआं हुआ करते थे। जो राहगीरों की प्यास बुझाने के साथ फसलों की सिंचाई के काम आते थे। लेकिन इनका प्रयोग न होने के कारण उनका अस्तित्व लगभग मिट चुका है। यदि इन्हें बचाने का प्रयास किया जाता तो यह बरसात के पानी को संचयन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते और भूजल स्तर किसी हद तक बचाया जा सकता था।
लगातार कम होते जा रहे भूजल स्तर को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। एक बार फिर से जल्द ही अभियान चलाकर लोगों को जागरूक किया जाएगा साथ ही कई अन्य और प्रयास किए जाएंगे। लोगों को चाहिए कि वह पानी की अहमियत को समझें और उसे बर्बाद करने की बजाय बचाने का काम करें। - अभिषेक पांडेय, मुख्य विकास अधिकारी।