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कोरोना काल में गेहूं का बाजार खत्म

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बिजनौर। कोरोना काल में जनता की मदद के लिए उन्हें सरकार ने गेहूं और चावल देकर उनकी मदद की लेकिन इससे गेहूं का किसानों का बाजार बैठ गया है। गेहूं का बाजार भाव 500 से 600 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गए हैं। गेहूं साल 2016 के सरकारी रेट से भी कम पर बिक रहा है। बाजार में किसान गेहूं बेचने तो आ रहे हैं, लेकिन गेहूं खरीदने के लिए कोई नहीं आ रहा है। जिन किसानों ने ऑफ सीजन में गेहूं बेचने के लिए भंडारण किया था उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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जिले में गन्ने के बाद गेहूं का रकबा सबसे ज्यादा रहता है। जिले में डेढ़ लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन में गेहूं बोया जाता है। जिले में कई जगह पर गेहूं क्रय केंद्र लगाए जाते हैं। जिले में चांदपुर आदि क्षेत्र में काफी जगह ऐसा है ,जहां पर जमीन रेतीली है और वहां पर गेहूं या चारे की ही फसल होती है। गेहूं की फसल से ही यहां के किसानों का गुजारा होता है। कुछ किसान गेहूं का भंडारण भी करते हैं और ऑफ सीजन में बेचते हैं। फसल की गहाई के समय के मुकाबले ऑफ सीजन में गेहूं का दाम ज्यादा रहता है। फसल को अच्छे दाम में बेचने के लिए किसान ऐसा करते हैं।
लॉकडाउन से पहले गेहूं के दाम दो हजार से 2100 रुपये प्रति क्विंटल थे। लॉकडाउन शुरू होते ही सरकार ने प्रति कार्ड राशन तो दिया ही, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत परिवार के प्रति सदस्य के हिसाब से पांच किलो अनाज भी अलग से नि:शुल्क दिया। यानि अगर किसी के घर में पांच सदस्य हैं तो उसे 25 किलो अनाज नि:शुल्क दिया गया। शुरूआत में इसमें केवल चावल दिया गया। इससे अलग 25 किग्रा अनाज सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर दिया गया। जिले के करीब छह लाख परिवारों ने इन योजनाओं का लाभ लिया। सरकार की यह दरियादिली उन किसानों को भारी पड़ी है, जिन्होंने थोड़ा ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए गेहूं की फसल का भंडारण किया था। चावल वेस्ट यूपी की जनता का गर्मियों का प्रमुख आहार है। जनता ने चावल तो खा लिया लेकिन गेहूं से बिलकुल किनारा कर लिया।
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कई कार्डधारकों ने तो अपना राशन में मिला गेहूं भी बाजार में बेच दिया। राशन की दुकान का बचा गेहूं भी बाजार में आ गया। इससे गेहूं के दाम गिरकर 1500 से 1600 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं जबकि गेहूं का सरकारी मूल्य ही 1925 रुपये प्रति क्विंटल है। आटा तक गेहूं के सरकारी मूल्य से कम कीमत पर बिक रहा है।
कुल बांटा गया राशन
सामान्य तौर पर बंटा राशन नि:शुल्क बांटा राशन
महीना गेहूू चावल गेहूं चावल
अप्रैल 7782 5224 00 12447
मई 7830 5253 00 12447
जून 7957 5338 00 12393
जुलाई 7923 5316 7435 4957
अगस्त 7957 5338 7474 4983
कुल 39454 26498 14910 47228
नोट:आंकड़े पूर्ति विभाग से लिए गए हैं। गेहूं व चावल मीट्रिक टन में हैं।
सात साल का गेहूं मूल्य
साल गेहूं मूल्य
2013-14 1350
2014-15 1400
2015-16 1520
2016-17 1625
2017-18 1735
2018-19 1840
2019-20 1925
नोट: ये मूल्य मंडी समिति से लिए गए हैं। साल 2017 व 18 में किसानों को सरकारी रेट से अलग दस रुपये की बोनस राशि भी प्रति क्विंटल दी गई थी।
मुनाफे के बजाए हुआ नुकसान
गांव शाहपुरलाल निवासी मंगू सिंह, सिकंदरी निवासी हरजिंदर सिंह, लालवाला निवासी लालवाला ने काफी गेहूं बेचने के लिए रोक रखा है। लेकिन अब उन्हें सरकारी दाम से भी कम दाम मिल रहे हैं। किसान मंगू सिंह का कहना है कि सीजन में ही गेहूं के दाम दो हजार से अधिक थे। इस समय गेहूं के दाम 2300 रुपये प्रति क्विंटल होने चाहिए थे। लेकिन दाम बहुत पिटे हुए चल रहे हैं।
चावल के दाम बढ़े
कोरोना काल में गेहूं से ज्यादा चावल ज्यादा मुफ्त बांटा गया। चावलों का उपभोग भी जनता ने ज्यादा किया। लेकिन इसके बाद भी चावल के रेट कम नहीं हुए हैं। चावल के रेट एक दो रुपये प्रति किग्रा बढ़ गए हैं। इसकी वजह है कि जनता ने चावल को अपने मुख्य भोजन में शामिल कर लिया है।
आटे की भी मांग खत्म
आटा मिल संचालक रजत के अनुसार लॉकडाउन से पहले वे 2100 रुपये प्रति क्विंटल पर गेहूं खरीद रहे थे और आटा 2400 रुपये प्रति क्विंटल बेच रहे थे। अब गेहूं 1600 रुपये प्रति क्विंटल को खरीद रहे हैं और आटा 1850 से 1950 रुपये प्रति क्विंटल पर बेच रहे हैं। आटे की डिमांड भी पहले के मुकाबले 30 प्रतिशत तक गिर गई है।
ये बोले भाकियू पदाधिकारी
सरकारी मूल्य से नीचे बिक रहा गेहूं
भाकियू जिलाध्यक्ष दिगंबर सिंह का कहना है कि किसानों के लिए आर्थिक मदद के नाम पर केवल लोन देने की बात की जाती है। इसके अलावा किसानों के दाम कुछ नहीं हैं। गेहूं सरकारी मूल्य से नीचे बिक रहा है लेकिन सरकार ने अब तक इसकी सुध नहीं ली है। सरकार की फसल का न्यूनतम मूल्य दिलाने की गारंटी कहां है।
सरकार करे नुकसान की भरपाई
भाकियू अंबावता जिलाध्यक्ष विजय कुमार सहरावत का कहना है कि गेहूं की फसल में किसानों के हाथ कुछ नहीं आ रहा है। अब और सरकार खेती को भी अनुबंध से जोड़ने की तैयारी कर रही है। जो किसान कम कीमत पर गेहूं बेचने को मजबूर हैं, सरकार उनके नुकसान की भरपाई करे।
कोई नहीं खरीद रहा गेहूं व्यापारी नेता सुशील जिंदल का कहना है कि किसान तो गेहूं बेचने आ रहे हैं लेकिन कोई खरीदने नहीं आ रहा है। बाजार से गेहूं की डिमांड बिलकुल खत्म हो गई है। व्यापारी भी हाथ पर हाथ रखकर बैठने को मजबूर हैं।
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