संवाद न्यूज एजेंसी
हल्दौर। गांव छजुपुरा सादात में नवासा ए रसूल हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत याद की गई। अशरा ए मुहर्रम के तीसरे दिन की पहली मजलिस दरगाहे फातेमा जैहरा और दूसरी मजलिस इमाम बारगाह में आयोजित हुई। मजलिसों को जाकिर मोहम्मद रजा और मौलाना मेहंदी अब्बास जैदी ने संबोधित किया।
मौलाना मेहंदी अब्बास ने कहा कि मुहर्रम महीने की दो तारीख 61 हिजरी को इमाम हुसैन अपने परिवार के साथ कर्बला में थे। वह एक हफ्ते तक यजीद की फौज को अमन के राह पर चलने के लिए समझाते रहे। मगर, फौज अपने खलीफा के हुक्म पर अमल करने के लिए अड़ी रही। इसके बाद हजरत इमाम हुसैन ने कहा ‘तुम मुझे एक रात की मोहलत दो, ताकि मैं अल्लाह की इबादत कर सकूं’। इस रात को ही आशूरा की रात कहा जाता है।
अगली सुबह खूनी जंग हुई, जिसमें यजीद की 80 हजार फौज के सामने इमाम हुसैन के 72 जानिसारों ने जैसी जंग लड़ी, उसका मुरीद उनकी दुश्मन फौज भी हो गई। इमाम हुसैन ने अपने नाना और अपने बाबा के सिखाए हुए ईमान का दामन मजबूती से पकड़े रखा। उनके कई साथी और परिवार के सदस्य शहीद हो गए।
मुहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और साथियों की मैय्यत को दफनाते रहे। लड़ते हुए जब नमाज का वक्त करीब आ गया, तो उन्होंने दुश्मन फौज से अस्र की नमाज अदा करने का वक्त मांगा। जब इमाम हुसैन सजदे में झुके तो दुश्मन ने धोखे से उन पर वार कर उन्हें शहीद कर दिया। मक्का में इमाम हुसैन की शहादत की खबर फैली तो हर तरफ मातम छा गया। यही वह तारीखी वाकया है, जिसने इस्लाम की नई सुबह को परवान चढ़ाया।
मजलिसों में सोजखानी मोहम्मद रजा, मोहम्मद अब्बास, नायाब हैदर, मोहम्मद आलम, रोशन अब्बास, कलीम हैदर, जरी अब्बास, सफदर अब्बास आदि ने की। पेशखानी मौहम्मद रजा और नौहेखानी मोहम्मद रजा, सफदर अब्बास, रोशन अब्बास, अम्मार जैदी, कासिफ जैदी ने की। कार्यक्रम का संचालन मीडिया प्रभारी शाही वास्ती ने किया।