बांदा। नवरात्र के तीसरे दिन शनिवार को दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप के दर्शन-पूजन के लिए मंदिरों में भक्तों की कतार लगी रही। नारियल, चुनरी, पान-बताशा व फल आदि अर्पित कर पूरे विधि-विधान से पूजन किया। महेश्वरी देवी, काली देवी, सिंहवाहिनी, मरही माता, चौसठ जोगिनी, कालका देवी, पीतांबरा देवी आदि प्रमुख मंदिरों में तड़के से देर रात तक भक्तों का हुजूम उमड़ता रहा। पूरा दिन मंदिर व आसपास भक्तिमय माहौल रहा। भजन-कीर्तन की धूम रही। पंडाल आयोजकों में भी आकर्षक सजावट की होड़ शुरू हो गई।
उधर, गिरवां संवाद के मुताबिक खत्री पहाड़ में स्थित विंध्यवासिनी देवी मंदिर में भी भक्तों की भीड़ रही। जगद्जननी के उद्घोष पूरा दिन गूंजते रहे। मेला में भी लोगों की खूब भीड़ उमड़ी। तिंदवारी, नरैनी, अतर्रा, कमासिन, कालिंजर, बेंदा घाट, मटौंध, ओरन, जसपुरा, खप्टिहा कलां, बिसंडा, मरका, बबेरू, पैलानी, बदौसा संवाद के मुताबिक मंदिरों और पंडालों में देवी दर्शन के लिए भक्तों की कतारें लगी रहीं।
51 देवी शक्तिपीठों में एक मां मढ़ीदाई का मंदिर
बबेरू। देश के प्रसिद्ध 51 देवी शक्ति पीठों में मां मढ़ी दाई का भी स्थान माना जाता है। खासियत यह है कि मां मढ़ी दाई की प्रतिमा के साथ ही देवाधिदेव का पंचमुखी शिवलिंग भी स्थापित है। मान्यता है कि यहां पर मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
बुजुर्गों का कहना है कि करीब 38 हजार वर्ष पहले मूर्ति की स्थापना की गई थी। पहले लोग इसे शिव मढिय़ा के नाम से जानते थे। धीरे-धीरे इसका नाम मढ़ी दाई मंदिर हो गया। बताते हैं कि अनादिकाल में यहां अर्जुन की दूसरी पत्नी उरिति के पुत्र बभ्रवाहन की राजधानी थी। जिससे कस्बे का नाम बबेरू पड़ा। बाद में आर्य राजा अनगसाई का साम्राज्य स्थापित हुआ। उस समय पूरे भारत देश में जैन धर्म का प्रभुत्व था। उसी समय मंदिर में पंचमुखी शिवलिंग की स्थापना हुई।
नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर में स्थापित पंचमुखी शिवलिंग व बबेरू के मां मढ़ीदाई मंदिर में स्थापित शिवलिंग दोनों एक जैसे हैं। सावन मास सहित चैत्र व शारदीय नवरात्र में यहां भक्तों की खासी भीड़ होती है। नवरात्र में मंदिर कमेटी की तरफ से प्रतिदिन कन्या भोज व भंडारे का आयोजन किया जाता है।
Queues for worshiping the form of Chandraghanta- फोटो : BANDA