समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी की घर वापसी हो गई। सारी अटकलों पर विराम लगाते हुए शनिवार को ‘साइकिल' पर सवार हो गए। लखनऊ में राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में बलिया जिले के कद्दावर नेता अंबिका चौधरी ने समर्थकों संग सपा की सदस्यता ली। बसपा के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के बड़े भाई सिब्कातुल्लाह अंसारी ने भी समर्थकों के साथ सपा की सदस्यता ली। सिब्कातुल्लाह गाजीपुर के मोहम्मदाबाद विधानसभा सभा क्षेत्र से 2007 में सपा और 2012 में कौमी एकता दल से विधायक रहे। 2017 में बसपा से मैदान में उतरे, लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा।
जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव से पहले अंबिका चौधरी और उनके बेटे आनंद चौधरी ने बसपा छोड़ दी थी। बलिया में आनंद को सपा ने जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में अपना प्रत्याशी बनाया था। तभी से अटकलें लगाई जा रही थी कि अंबिका चौधरी भी जल्द ही सपा ज्वॉइन कर लेंगे।
बता दें कि प्रदेश स्तर पर कद्दावर नेता के तौर पर पहचान बनाने वाले अंबिका चौधरी ने वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बलिया के फेफना विधानसभा से टिकट कटने से नाराज होकर सपा से इस्तीफा दे दिया था और बसपा में शामिल हो गए थे।
मायावती ने उन्हें फेफना विधानसभा सीट से प्रत्याशी भी बनाया था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन से बलिया सीट से सनातन पांडेय चुनाव लड़े। इसमें अंबिका चौधरी ने सपा प्रत्याशी का साथ दिया था।
अंबिका चौधरी वैसे तो वर्षों से बलिया जिले की राजनीति में सक्रिय थे लेकिन उन्होंने पहली बार वर्ष 1991 में जनता दल के टिकट पर कोपाचीट विधानसभा सीट से भाग्य आजमाया था। हालांकि वह चुनाव हार गए लेकिन आगे की मजबूत राजनीति का संकेत भी दे गए। वर्ष 1993 में पहली बार सपा से विधायक चुने गए। इसके बाद वर्ष 1996, 2002 तथा 2007 में लगातार चार बार विधायक बने। वर्ष 2002 में बनी सपा की सरकार में कद्दावर मंत्री भी रहे।
चौधरी के सपा के स्थापना काल से जुड़े होने के कारण पार्टी में उनकी मजबूत हैसियत थी। वर्ष 2012 के चुनाव में अंबिका चौधरी हार गए लेकिन प्रदेश में सपा सरकार बनी और एक बार फिर वह मंत्री बने। कुछ माह बाद एमएलसी भी चुने गए।
हालांकि सपा के अंदरुनी विवाद के चलते सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर में उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। इतना ही नहीं वर्ष 2017 के चुनाव में सपा से टिकट नहीं मिलने के कारण वह दशकों पुरानी पार्टी को छोड़कर बसपा में शामिल हो गए और फेफना विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़े।
जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव से पहले बसपा से मोहभंग हुआ और अब फिर से सपा के हो गए। उनके इस कदम से बलिया जिले के सियासी समीकरण गड़बड़ा गए हैं। बसपा को उनके इस कदम से करारा झटका लगा है। वहीं भाजपा भी वोटों के ध्रुवीकरण के फेर में फंस गई है। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी के इस दांव से भाजपा को कई फेरबदल करने पड़ेंगे।