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सावधान: बच्चों के चौंकाने वाले आंकड़े, माता-पिता ने जिद पूरी नहीं की तो छोड़ दिया घर, पढ़िए पूरी रिपोर्ट

Tue, 19 Oct 2021 06:49 PM IST
कपिल kapil मुकेश पंवार, अमर उजाला, बागपत

सार

उत्तर प्रदेश के बागपत शहर सहित कई जिलों में बच्चों को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। माता-पिता की थोड़ी सी डांट से ही बच्चे घर छोड़कर चले गए। इनमें कई बच्चों की मौत के मामले भी सामने आए हैं।
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रेलवे स्टेशन पर मिले लावारिस बच्चे। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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अगर, आपका बच्चा गुमसुम है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करता है या फिर किसी चीज को पाने के लिए हद से ज्यादा जिद करता है और न मिलने पर घर छोड़ने या मरने की धमकी देता है तो सावधान हो जाइएं। क्योंकि यह स्थिति बच्चे को अवसाद में ढकेल सकती है और वह घर से भागने जैसा कदम भी उठा सकता है। जीआरपी व आरपीएफ ने चार साल में ऐसे 532 बच्चों को रेलवे स्टेशन या फिर ट्रेन से पकड़ा है, जो माता-पिता के सख्त रुख और जरा सी बात पर घर से भाग जाते हैं। ऐसे बच्चों को अफसरों ने उनके घर तक सकुशल पहुंचा तो दिया है, लेकिन तेजी से बढ़ते इस तरह के मामलों से हैरान भी है। आंकड़ों की माने तो इन चार साल में सहारनपुर से 150, दिल्ली से 139, शामली से 113, बागपत से 92 और मेरठ से 38 बच्चों ने घर छोड़ा है।

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केस नंबर एक : 13 अक्टूबर को मलकपुर गांव में स्कूल न जाने पर पिता के डांटने पर कक्षा दस के छात्र दीपांशु घर से भाग गया था। पिता ने उसकी बड़ौत कोतवाली में गुमशुदगी भी दर्ज कराई थी। मगर, गुमशुदगी के अगले ही दिन दीपांशु का शव खेत में फांसी पर लटका मिला था।

केस नंबर दो : 13 अगस्त को शिवम पुत्र रामकुमार निवासी चुग्गी नंबर 210 गली नंबर सात के सामने अजितनगर, गांधी नगर पूर्वी दिल्ली जो पिता के डांटने पर घर से भाग आया था। उसे जीआरपी ने बड़ौत रेलवे स्टेशन पर अकेले पाकर अपने पास बैठा लिया था। प्यार से बच्चे से बातचीत कर उसका पता पूछा गया और बाद में हेडकांस्टेबल कुंवरपाल व राहुल ने गांधी नगर पहुंचकर उसके पिता को सकुशल सौंपा।
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केस नंबर तीन : 20 सितंबर को इमरान पुत्र कल्लू निवासी देवबंद दोस्त के पास प्लास्टिक की बंदूक देखकर मां-पिता से मांग कर रहा था। कई बार कहने पर जब मां-पिता ने नहीं दिलाई तो वह घर से भाग आया। जीआरपी ने उसे खेकड़ा स्टेशन से पकड़कर उनके परिजनों को सकुशल सौंपा।

स्टेशन पर अकेले बच्चों की निगरानी के लिए एक टीम लगाई गई है। उसका काम सिर्फ बच्चों की निगरानी करना है, जो प्लेटफॉर्म या ट्रेन में अकेले होते हैं। बाद में उन बच्चों को सकुशल उनके परिजनों को सौंपा है। - इंस्पेक्टर चतुर सिंह, जीआरपी बड़ौत

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कंडक्ट डिसऑर्डर के शिकार हो रहे बच्चे
नोडल अधिकारी मानसिक रोग डॉ. अजेंद्र मलिक बताते है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चे कंडक्ट डिसऑर्डर के शिकार हो रहे हैं। इस बीमारी से ग्रस्त बच्चे झूठी कहानी बनाते हैं। गुस्सैल स्वभाव के हो जाते हैं। अगर वह किसी चीज को चाहने लगे तो उसे पाने के लिए हर हद तक पहुंच जाते हैं। बताया कि व्यस्तता के चलते मां-पिता बच्चों से कम ही बातचीत करते हैं। इससे बच्चों और अभिभावकों के बीच बचपन से ही एक दूरी बन जाती है। ऐसी स्थिति में बच्चे सही गलत का फर्क नहीं समझ पाते हैं। 

अभिभावकों के लिए सलाह
1- बच्चों को गलती करने पर समझाएं, न की डांटे। छोटी-मोटी सजा का सहारा ले।
2- बच्चों को अधिक समय दें, उनके दिल की बात सुनें। बच्चों को प्यार करें, लेकिन जिद्दी न बनाएं।
3- बच्चों को कभी ऐसा महसूस न होने दे कि वह अभिभावकों पर निर्भर है।
4- बच्चों को खराब संगत से दूर रखें।

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जीआरपी व आरपीएफ द्वारा स्टेशन से पकड़े गए बच्चों का आंकड़ा
वर्ष      बालक   बालिका    कुल

2018    101       25        126
2019    117       21        138
2020    107      12        119
2021    143      6         149
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