इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी कैदी को पेरोल पर रिहा करने का अधिकार सरकार को है। सरकार चाहे तो कैदी की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए उसकी सजा निलंबित कर रिहाई का आदेश दे सकती है। हाईकोर्ट ने हृदय रोग से पीडित मां का इलाज कराने के लिए पेरोल पर रिहाई की मांग में दाखिल सजायाफ्ता कैदी की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी है कि उ प्र (कैदियों की सजा निलंबन)नियमावली 2007 के तहत राज्य सरकार को इसका अधिकार प्राप्त है। इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका पोषणीय नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति एस पी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति शमीम अहमद की खंडपीठ ने हमीरपुर के सिसोलर थाना क्षेत्र के रिंकूउर्फ बृजेन्द्र की याचिका पर दिया है।
याची का कहना था कि उसकी बूढी मां हृदय रोग से पीड़ित बिस्तर पर हैं। उसकी जांच कर इलाज कराने के लिए पेरोल पर रिहाई का निर्देश दिया जाए। सरकारी अधिवक्ता का कहना था कि पेरोल के लिए सक्षम अदालत में जाना चाहिए। हाईकोर्ट में याचिका पोषणीय नही है।
कोर्ट ने नियमावली के उपबंधों पर विचार करते हुए कहा कि सरकार जिलाधिकारी व एस पी से जांच रिपोर्ट मंगाकर सजा निलंबित कर सकती है। वह पेरोल पर,रिहाई बांड लेकर एक माह के लिए रिहा कर सकती है। एक माह के लिए सजा का निलंबन बढा भी सकती है। नियमावली में सजा निलंबन की स्थितियों का उल्लेख है।याचिका पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।