कुल्लू दशहरा उत्सव के समापन पर लंका दहन के लिए देवताओं के साथ रवाना होते भगवान रघुनाथ।
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कोरोना के बीच अठारह करड़ू की सोह में मनाए जा रहे सात दिवसीय देवी-देवताओं के महाकुंभ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव गुरुवार को लंका पर चढ़ाई और भगवान रघुनाथ की जीत के साथ संपन्न हो गया। भगवान रघुनाथ लंका पर चढ़ाई करने के लिए रथ में सवार हुए। उनके साथ माता हिडिंबा, बिजली महादेव और जमदग्नि ऋषि समेत करीब 30 से अधिक देवी-देवता साथ रहे।
लंका दहन की परंपरा का निर्वहन करने के बाद भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर सुल्तानपुर लौट गए। इस दौरान रघुनाथ का रथ खींचने के लिए सैकड़ों लोग उमड़े। वहीं भव्य देव मिलन के बाद सभी देवी-देवता अपने देवालयों को लौट गए। इससे पहले करीब तीन बजे भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में लंका दहन के लिए तैयारियां शुरू हुईं। भगवान रघुनाथ को अस्थायी शिविर से लाकर रथ में बिठाया गया। अपराह्न 3:50 बजे रघुनाथ रथ में सवार होकर लंका दहन के लिए निकले। लंका दहन के लिए माता हिडिंबा का रथ रवाना होते ही रघुनाथ की रथयात्रा शुरू हुई।
इससे बाद पालकी में सवार भगवान रघुनाथ के साथ खराहल के आराध्य देवता बिजली महादेव, जमदग्नि ऋषि, भोष के देवता वीरनाथ, नग्गर की माता त्रिपुरा सुंदरी आदि देवता भी रथयात्रा में शामिल हुए। माता हिडिंबा का रथ सबसे आगे लंका दहन की परंपरा पूरा करने के लिए आगे बढ़ा। लंका पर विजय पाने के बाद भगवान रघुनाथ देवी-देवताओं के साथ वापस अपने देवालय की ओर निकले। इस दौरान ढालपुर मैदान जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा। दशहरे में इस बार रिकॉर्ड 281 देवी-देवता शामिल हुए।
मैदान के एक कोने पर रहा पुलिस का पहरा
ढालपुर मैदान के एक छोर पर लंका दहन की परंपरा निभाई गई। यहां पुलिस का सख्त पहरा रहा। पुलिस ने यहां से लोगों को परंपरा निभाए जाने तक जाने नहीं दिया। यहां पर माता हिडिंबा के देवलु और राजपरिवार के लोग ही गए।