हिमाचल प्रदेश में साल 1914 में सुकेत (अब सुंदरनगर) गदर पार्टी की गतिविधियों का केंद्र बन गया था। सन 1924 में राजा की ओर से लगान और बेगार प्रथा से तंग आकर जनता ने विद्रोह कर दिया। इस कारण सुंदरनगर के राजा लक्ष्मण सेन को देहरादून भागना पड़ा।
1945 में सुकेत राज्य में प्रजामंडल का गठन हुआ। सुंदरनगर के देरडू निवासी समाजसेवी मिया रतन सिंह इसके प्रधान चुने गए। इनके नेतृत्व में प्रजामंडल से सुकेत राज्य में विद्रोह का बिगुल बज उठा। अगस्त 1947 तक प्रजामंडल ने अपने आप को राजा के खिलाफ संघर्षरत रखा। राजा ने इस आंदोलन को दबाने के लिए कई कोशिशें की। आंदोलनकारियों को अमानवीय यातनाएं दी गईं। कई नेताओं को वर्षों तक मुल्तान जैसे गर्म स्थान पर जेल भुगतनी पड़ी।
अंत में जब आंदोलन की चिंगारी बुझ नहीं पाई तो राजा लक्ष्मण सेन ने प्रशासन के लिए राज्यसभा बनाने की घोषणा की। सुकेत के अधिकांश लोगों ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया। फरवरी 1948 में हिमाचल हिल्ज स्टेट काउंसिल की ओर से अंतरिम सरकार का गठन किया गया। इसके प्रधान पंडित शिव चंद रमौल सिरमौर निवासी थे। 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश का गठन किया गया। जिसमें सुकेत रियासत का स्थान प्रथम रहा।
700 वर्ष पुरानी सुकेत रियासत का इस तरह हुआ पतन
पद्म देव के नेतृत्व में फरवरी 1948 को सत्याग्रहियों की ओर से सुकेत राज्य पर धावा बोल दिया गया। जैसे ही पद्म देव और डॉ. यशवंत सिंह परमार सत्याग्रहियों सहित सुकेत की सीमा पर पहुंच, बैरियर पर उन्हें बस से उतरते ही एक शाही फरमान के अंतर्गत रोक लिया गया। इसके बाद पुन: पदम देव सत्याग्रहियों का एक अन्य जत्था सुंदरनगर की तरफ रवाना हुआ। आंदोलनकारी सुकेत रियासत के सुंदरनगर और करसोग का ओर से घुसे।
राजा का ध्यान सुंदरनगर पर केंद्रित था, इस अफवाह से कि पद्म देव ने लगभग 4000 लोगों को लेकर सुंदरनगर पर धावा बोल दिया है, राजा विचलित हो उठे। 18 फरवरी 1948 को प्रात: ही सुकेत राज्य की फेरनू गांव स्थित चौकी पर कब्जा कर लिया गया। सायं 5 बजे तक करसोग तहसील पर अधिकार जमा लिया गया। तहसीलदार और थानेदार को बंदी बना कर जूतों से मारा-पीटा गया। पुलिस थाने के सभी हथियार जब्त कर लिए गए।