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Panchopachara Puja: जानिए क्या है पंचोपचार पूजा पद्धति, जानिए क्या है इसका महत्व

Fri, 10 Dec 2021 07:23 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पंचोपचार पद्धति - फोटो : istock
Panchopachara Puja: जब हम अपने शास्त्रों की सलाह के अनुसार पूजा विधि करते हैं तब हमें अपने सर्वज्ञ ऋषियों के संकल्प-शक्ति (संकल्प की ऊर्जा) का लाभ मिलता है। शास्त्रों में वर्णित पूजा करते समय परम भक्ति और भाव समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यदि पूजा विधि करते समय भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति की कमी होती है, तो वह उन तक नहीं पहुंचता है; क्योंकि, भगवान भव के लिए तरसते हैं। शास्त्रों में वर्णित विज्ञान के अनुसार और देवता के प्रति आस्था से भरे अंतःकरण के साथ किए गए उपदेशों को एक देवता की पूजा कहा जाता है। तभी यह देवता की अपेक्षाओं के अनुसार होता है, और इसे सही मायने में 'पूजा' कहा जा सकता है हिंदू धर्म के अनुसार सगुण (भौतिक) उपासना का आधार देवताओं की पूजा विधि (अनुष्ठानात्मक पूजा) है। यदि हम भगवान की पूजा उचित तरीके से करते हैं तो भगवान हम पर प्रसन्न होंगे और हम पर अपनी कृपा बरसाएंगे। इसलिए, धर्मग्रंथों ने हमें धार्मिकता का पालन करना सिखाया है और भाव (आध्यात्मिक भावना) समृद्ध तरीके से हम षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा  करनी चाहिए। पंचोपचार, अर्थात्, गंध लगाना, फूल चढ़ाना, धूप (लोबान), आरती और नैवेद्य अर्पित करना का निर्माण करता है। 

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पंचोपचार पद्धति - फोटो : istock
क्या है पंचोपचार पद्धति
आपने पूजा की पंचोपचार पद्धति के बारे में सुना होगा। सर्वप्रथम इसमें पांच देवताओं का पूजन किया जाता है। श्री गणेश जी, शंकर भगवान , दुर्गा माता (भवानी, पार्वती) विष्णु भगवान एवं सूर्यदेव। इस पद्धति में किसी भी देवी-देवता का पूजन पांच प्रकार से किया जाता है। 
 गन्धं पुष्पं तथा धूपं दीपं नैवेद्यमेव च । 
अखंडफलमासाद्य कैवल्यं लभते धु्रवम् ।

अर्थात् देव पूजन में गंध, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य इन पांच चीजों का प्रयोग किया जाता है। 
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पंचोपचार पद्धति (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : istock
पंचोपचार पद्धति की मुद्राएं 
शास्त्रों में पंचोपचार पद्धति की पांच मुद्राएं हैं। इन मुद्राओं के माध्यम से देवी-देवता उस पूजन सामग्री को ग्रहण करते हैं। इन सामग्रियों को अर्पित करने के लिए इनके नाम के अनुसार ही गंध मुद्रा, पुष्प मुद्रा, धूप मुद्रा, दीप मुद्रा तथा नैवेद्य मुद्रा कहा जाता है।

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गंध मुद्रा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : istock
गंध मुद्रा
मुद्राएं बनाने के लिए दोनों हाथों की अंगुलियों और अंगूठे का प्रयोग किया जाता है। अंगूठा तथा कनिष्ठिका अंगुली को एक साथ मिला देने से गंध मुद्रा बनती है। इसके अनुसार सबसे पहले अपने आराध्य को अनामिका से (कनिष्ठिका के समीप की उंगली से) चंदन लगाएं। फिर दाएं हाथ के अंगूठे और अनामिका के बीच चुटकीभर कर पहले हलदी, फिर कुमकुम देवता के चरणों में अर्पित करें ।
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पुष्प मुद्रा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : istock
पुष्प मुद्रा 
अंगूठे की जड़ में तर्जनी को लगाने पर पुष्प मुद्रा बनती है। इसके अनुसार देवता को उनके प्रिय पुष्प चढ़ाएं। जैसे- शिवजी को बिल्वपत्र तथा श्री गणेशजी को दूर्वा और लाल पुष्प। पुष्प देवता के सिर पर न चढ़ाकर उनके चरणों में अर्पित करें । डंठल देवता की ओर एवं पंखुड़ियां (पुष्पदल) अपनी ओर कर पुष्प अर्पित करें ।
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धूप मुद्रा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : istock
धूप मुद्रा
तर्जनी की जड़ में अंगूठा लगाने से धूप मुद्रा का निर्माण होता है। भगवान को धूप दिखते समय हाथ नहीं फैलते बल्कि भगवान के प्रिय खुशबू वाली धूप या अगरबत्तियों से उनकी आरती उतारें। धूप दिखाते समय ॐ की आकृति में धूप दिखनी चाहिए। 
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दीप मुद्रा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : istock
दीप मुद्रा 
मध्यमा के मूल भाग में अंगूठा मिलाने से दीप मुद्रा का निर्माण होता है। दीप-आरती करते समय इस बात का ध्यान रखें की आरती धीमी गति से तीन बार की जानी चाहिए।  दीप जलाते समौ इन बातों का ध्यान रखना भी आवश्यक है- 
  • कभी भी एक दीप से दूसरा दीप न जलाएं। 
  • यदि आप तेल और घी का दीप  जला रहे हैं तो कभी भी तेल के दीप से घी का दीप न जलाएं। 
  • प्रतिदिन तेल के दीप की नई बाती जलाएं। 
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नैवेद्य मुद्रा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : amar ujala
नैवेद्य मुद्रा
अनामिका अंगुली की जड़ में अंगूठा मिलाने से नैवेद्य मुद्रा बन जाती है। नैवेद्य के लिए सिद्ध (तैयार) की गई थाली में नमक न परोसें। देवता को नैवेद्य निवेदित करने से पहले अन्न ढंककर रखें। नैवेद्य समर्पण में सर्वप्रथम इष्टदेवता से प्रार्थना कर देवता के समक्ष भूमि पर जल से चौकोर मंडल बनाएं तथा उस पर नैवेद्य की थाली रखें । नैवेद्य समर्पण में थाली के चारों ओर एक ही बार जल का मंडल बनाएं। नैवेद्य निवेदित करते समय ऐसा भाव रखें कि 'हमारे द्वारा अर्पित नैवेद्य देवता तक पहुंच रहा है तथा देवता उसे ग्रहण कर रहे हैं।" देवता के लिए नैवेद्य अर्पण करते समय पंच प्राणों की संतुष्टि के लिए पंच ग्रास अवश्य ही देना चाहिए। बाएं हाथ को कमलवत कर लेने से ग्रास मुद्रा बन जाती है। 
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