'चक्रव्यूह' के मंचन के साथ भोपाल में इंडीमून्स नाट्य समारोह शुरू

शकील खान

1 of 4

शकील खान
कला समीक्षक


'कोई भी अपने कर्मों में रचे गए चक्रव्यूह से कभी मुक्त नहीं हो सकता।' श्रीकृष्ण के इस शास्वस्त संदेश की गूंज मंगलवार की शाम रवीन्द्र भवन के हंसध्वनि सभागार में सुनाई दी। अवसर था इंडीमून्स नाट्य समारोह में नाटक 'चक्रव्यूह' के 131 वें प्रदर्शन का। कुरुक्षेत्र की रक्त-रंजित धरती को संबोधित करते हुए अपने चिरपरिचित अंदाज और कृष्ण के बारे में स्टेज पर नितीश भारद्वाज को देखना भोपाल के दर्शकों के लिए नया और दिलचस्प अनुभव था। इस अनुभव को और अधिक यादगार बनाते हैं अभिमन्यु का किरदार निभाने वाले साहिल छाबड़ा।


 

2 of 4

महाभारत के युद्ध के तेरहवें दिन की युद्ध गाथा को सुनना ही रोमांच पैदा करता है। इस रोमांच को अपने चरम पर देखने का मौका देता है 'चक्रव्यूह'। संगीत, लाइट और कलाकारों के सजीव अभिनय से सजी यह प्रस्तुति अपने कमाल के युद्ध दृश्यों के चलते यादगार की प्रस्तुति के रूप में सामने आती है। तुकांत छंदों में लिखा गया नाटक अपने रोचक और सजीव एक्शन दृश्यों के कारण भी दर्शकों को अपने मोहपाश में बांधे रखने में सफल होता है। नाटक न सिर्फ युद्ध कला के रूपों को ही प्रदर्शित करता है अपितु इसके पीछे छिपे गहन जीवन दर्शन को भी प्रभावी रूप में सामने लाता है। कर्म, धर्म, निष्ठा, और माता-पिता के प्रति उत्तरदायित्व जैसे संदेशों के माध्यम से।

 

3 of 4

महाभारत के योद्धाओं का जि़क्र 'अभिमन्यु' और 'चक्रव्यूह' के बिना अधूरा है। अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदने की कला कहां से सीखी? लोकप्रिय दंतकथाओं के अनुसार अभिमन्यु उस समय अपनी मां सुभद्रा की कोख में था। वह इतना बुद्धिमान था कि मां की कोख में रहते हुए ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने की कला सीख ली थी। हालांकि उस समय सुभद्रा अर्जुन की बातें सुनते-सुनते सो गई थी। इसलिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो पता चल गया था लेकिन उसे यह नहीं पता था कि इससे बाहर कैसे निकलना है। सवाल यह भी है श्रीकृष्ण ने आखिर क्यों अभिमन्यु को नहीं बचाया? जबकि वे जानते थे कि उसकी जिंदगी महाभारत के युद्ध के तेरहवें दिन समाप्त हो जाएगी। यह एक लंबी और अलग कथा है लेकिन संक्षेप में ये है कि श्रीकृष्ण को पता था कि अभिमन्यु की मृत्यु 16वें साल में हो जाएगी।

कहानी रोचक है, लेकिन रोचक होना अपनी जगह है कहानी ऐसी है जिसे हर कोई जानता है, बच्चे-बच्चे को पता है। जब सबको पता है तो कोई सुनेगा क्यों, देखेगा तो बिलकुल भी नहीं। यानि चुनौती से भरपूर है ये काम। ऐसे कथानक को कहने का नया अंदाज ही दर्शकों को डेढ़ घंटे से अधिक समय तक हॉल में बैठा सकता है। कहने में हर्ज नहीं है कि निर्देशक अतुल सत्य कौशिक अपने 'अंदाज' से दर्शकों को लुभाने में सफल रहे।

 

4 of 4

राधव प्रकाश मिश्र की प्रकाश परिकल्पना प्रस्तुति को प्रभावी बनाने में अपने निर्देशक की भरपूर मदद करती है और खास रोल अदा करती है। संगीत भी लाइट के साथ सार्थक कदमताल करता नजर आता है। कलाकारों का अभिनय प्रस्तुति में चार चांद लगा देता है। नितीश और साहिल तो धुरी थे ही। भानु राणा (दुर्योधन), तरुण डंग (द्रोणाचार्य), ललित भारद्वाज (भीष्म) गौरव शर्मा (युधिष्ठिर), नवीन कुमार (शकुनि) भी अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं।

'चक्रव्यूह' क्यों? सवाल के जवाब में  निर्देशक अतुल सत्य कौशिक के अनुसार पौराणिक कहानियों में नए तथ्य, व्याख्या और विवेचना अभी भी बची हुई है जो हमारे सामने आ रही है। इन कहानियों का समय पर खरा उतरना ही इनको कालजयी बनाता है।     

इससे पहले दोपहर में इंडिमून्स आर्ट फेस्टिवल के सेंटर स्टेज कार्यक्रम के तहत क्लब लिटरेरी द्वारा 'मॉयथोलॉजी रूट्स ऑफ परफॉर्मेंस' टॉक शो हुआ। सीमा रायजादा के संचालन में हुए इस टॉक शो में नितीश भारद्वाज, पुलिस कमिश्नर हरिनारायण चारी मिश्रा, डॉ अनुराधा शंकर, रामगोपाल सोनी और अतुल सत्य कौशिक ने अपने विचार साझा किए। नितीश का मानना है कि रामायण और महाभारत मिथ्य नहीं हमारी संस्कृति की महान धरोहर हैं। हरिनारायण चारी मिश्रा ने कहा कि रोजाना देखे जाने वाले अपराधों को समझने और समाधान खोजने में महाकाव्य मदद करते हैं। अनुराधा शंकर का कहना था कि मैथिली होने के कारण सीता उनकी प्रेरक और प्रिय हैं. रामगोपाल सोनी के अनुसार रामायण में बहुत महीन और विशाल भौगोलिक जानकारी मिलती है।

एक वर्ष पहले

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Bajrang Lal

19 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12655 कविताएं

View Profile