- पर्यावरण क्लीयरेंस में छूट का दुरुपयोग
भारत सरकार के नियमों के अनुसार 25 मेगावाट से कम क्षमता की बिजली परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय क्लीयरेंस की जरूरत नहीं है। इसी ढील का लाभ उठा कर सत्ता में बैठे लोग निजी कंपनियों से सांठगांठ कर अति संवेदनशील क्षेत्रों में भी प्रोजेक्टों की बंदरबांट करते रहे हैं।
उदाहरण यह कि सरकार द्वारा निजी क्षेत्र को विकास के लिए आंबंटित कुल 33 नई परियोजनाओं में से 24 परियोजनाएं 25 मेगावाट से कम क्षमता की होने से स्वतः ही उन्हें अति संवेदनशील क्षेत्रों में भी पर्यावरणीय बंधनों से मुक्त करा दिया गया।
नवंबर 2010 में जब इसी तरह की 56 बिजली परियोजनाओं के आंवटन में भ्रष्टचार की शिकायत हाइकोर्ट तक पहुंची तो राज्य सरकार को कोर्ट में सुनवाई से पहले स्वयं ही सारे आबंटन रद्द करने पड़े थे।
वर्तमान में यमुना और टोंस पर 17 छोटी बड़ी परियोजनाऐं उत्पादनरत् हैं तथा 20 परियोजनाऐं प्रस्तावित हैं। अलकनंदा कैचमेंट में 6 परियोजनाएं चालू हैं और 8 निर्माणाधीन हैं। जबकि इसी क्षेत्र में 24 नई परियोजनाऐं विभिन्न विकासकर्ताओं को आवंटित की जा चुकी हैं। राज्य में इस समय कुल 37 परियोजनाएं उत्पादनरत् हैं और उनमें भी 18 परियोजनाएं निजी हाथों में हैं।
इनके अलावा वर्तमान में राज्य सरकार के उपक्रम यूजेवीएनएल को 2723.8 मेगावट क्षमता की 32, केन्द्रीय उपक्रमों को 5801 मेगावाट की 32 और निजी क्षेत्र की कंपनियों को 1360.8 मेगावाट की 33 परियोजनाऐं विकसित करने के लिये आवंटित की गई हैं।
इन 9885.6 मेगावाट की 97 आबंटित परियोजनाओं में से ही 24 को सुप्रीम कोर्ट ने रोका हुआ है। जिन्हें खुलवाने के लिए सरकार बिजली की किल्लत का हवाला देते हुए पूरा जोर लगा रही थी।
- चार धाम सड़क के लिए 50 हजार पेड़ों का सफाया
हिमालय की अत्यंत संवेदनशीलता को अनुभव करते हुए 2001 में इसरो ने देश के 12 विशेषज्ञ संस्थानों के 54 वैज्ञानिकों से उत्तराखंड का ‘लैंड स्लाइड जोनेशन एटलस’’ बनाया था जिसमें इसी चारधाम मार्ग पर सेकड़ों की संख्या में सुप्त और सक्रिय भूस्खलन चिन्हित किए गए थे। लेकिन इस सर्वेक्षण को नजरंदाज कर चारधाम ऑल वेदर रोड के नाम पर लगभग 50 हजार पेड़ काट दिए गए और कुल 826 किमी लंबे मार्ग पर पहाड़ों को बुरी तरह काट दिया गया। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप भी विलंब से ही हो सका। अब सेकड़ों सुसुप्त भूस्खलनों के सक्रिय होने की आशंका बढ़ गई है।
- भूस्खलन जोनिंग मैप की अनदेखी
एनआइडीएम की रिपोर्ट में भूस्खलन जोनेशन मैपिंग का प्राथमिकता के आधार पर पालन, निर्माण कार्यों में विस्फोटों के प्रयोग पर रोक, सड़क निर्माण में वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर, ढलानों के स्थिरीकरण के ठोस प्रयास और ग्लेशियल लेक तथा नदी प्रवाह निगरानी का ठोस ढांचा तैयार करने की सिफारिश भी की गई थी।
अगर इन सिफारिशों पर ध्यान दिया जाता तो पहाड़ इस तरह नहीं काटे जाते और केदारनाथ जैसे संवेदनशील स्थान पर सीमेंट कंकरीट का इतना बड़ा ढांचा भी खड़ा नहीे किया जाता और अब ना ही एवलांच संभावित बदरीनाथ धाम की हजामत की तैयारी न होती।
- हिमालयी आपदाओं में 4 गुना वृद्धि
पर्यावरण संबंधी अनुसंधानों में संलग्न संस्था ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायर्नमेंट एण्ड वाटर’ (सीईईडब्लु) द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में 1970 की अलकनंदा बाढ़ के बाद त्वरित बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने, हिमनद झीलों के फटने और बिजली गिरने आदि आपदाओं में चार गुना वृद्धि हो गई है। इन आपदाओं के खतरे में राज्य के 85 प्रतिशत जिलों की 90 लाख से अधिक आबादी आ गई है। रिपोर्ट में इन आपदाओं का कारण पर्यावरण की उपेक्षा बताया गया है।
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