पहलवान योगेश्वर दत्त के पहले गुरु और हरियाणवी संस्कृति के स्तम्भ और रागनी गायकों के सम्राट मास्टर सतबीर पंचतत्व में विलीन हो गए। देखिए तस्वीरें।
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ओलंपियन योगेश्वर दत्त के पहले कोच मास्टर सतबीर सिंह का अंतिम संस्कार
- फोटो : अमर उजाला
रोहतक में गोहाना के गांव भैंसवाल में लम्बी बीमारी के बाद सोमवार सुबह 66 साल की आयु में उनका निधन हो गया था। आज दोपहर उनका अंतिम संस्कार योगेश्वर दत्त के खाली पड़े प्लॉट में किया गया। योगेश्वर दत्त व प्रबुद्ध नागरिकों समेत सैंकड़ों लोगों ने उन्हें आखिरी विदाई दी। गुरू के देहांत पर योगेश्वर दत्त की आंखों से आंसू नहीं थम रहे थे। वहीं हरियाणा के मुख्य लोक कलाकार के देहांत के बाद उनके समर्थकों की आंखों में भी एक दुख की झलक दिखाई दी।
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ओलंपियन योगेश्वर दत्त के पहले कोच मास्टर सतबीर सिंह का अंतिम संस्कार
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मास्टर सतबीर तीन महीने से डायलिसिस पर थे, सुबह सवा छह बजे अंतिम सांस ली। वे पीटीआई अध्यापक के तौर पर सेवानिवृत हो चुके थे। सूर्यकवि लख्मीचंद के किस्सों को आमजन तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका रही। इन की एक खासियत यह भी थी कि इन्होंने कभी महिला कलाकारों के साथ नही गाया। हरियाणवी रागिनी के साथ-साथ ये ये गांव भैंसवाल में अपना अखाड़ा भी चलाते थे। पहलवान योगेश्वर दत्त भी इन्हीं के अखाड़े से निकले हुए हैं। मास्टर सतबीर के निधन की खबर सुन उनके फैंस में शोक की लहर दौड़ गई।
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ओलंपियन योगेश्वर दत्त के पहले कोच मास्टर सतबीर सिंह का अंतिम संस्कार
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13 अप्रैल 1951 में गांव भैंसवाल कलां में मास्टर सतबीर सिंह का जन्म एक साधारण से परिवार में हुआ। मास्टर चार भाई सूरजभान, उमेद सिंह, प्रेमसिंह, रामेहर व एक बहन सावित्री से छोटा था। वही राजकौर छोटी बहन है। मास्टर सतबीर सिंह ने ग्रेजुएशन पास करके अध्यापक की नौकरी पर गांव जौली में नियुक्ति की। इसके बाद गांव रभड़ा में 16 साल तक और 9 साल तक गांव रिवाड़ा में सेवा देकर 2009 में सेवानिवृत्त हो गए।
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मास्टर सतबीर का एक लड़का संदीप उर्फ काला, दो बहन ममता व राखी है। संदीप तीन साल से अपने पिता की विरासत संभाल रहा है। वहीं दोनों बहनों की शादी कर अपने मायके जा चुकी हैं। मास्टर सतबीर के तीन बड़े भाई सूरजभान, उमेद सिंह व रामेहर का पहले ही निधन हो चुका है। परिजनों ने बताया कि मास्टर सतबीर को शूगर की बीमारी थी। तीन महीने पहले उन्हें डायलेसिस की बीमारी हो गई थी। उनका ईलाज रोहतक के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। घर पर लेटे-लेटे मास्टर सतबीर अपनी रागनियों को गुनगुनाते रहे थे। इतना ही नहीं पुराने किस्सों को याद करते रहते थे।
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ओलंपियन योगेश्वर दत्त के पहले कोच मास्टर सतबीर सिंह का अंतिम संस्कार
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परिजन बताते हैं कि मास्टर सतबीर ने 1971 में पंडित लख्मी चंद से प्रेरित होकर रागनियों की शुरूआत की थी। आज वे बीमारी से ग्रस्त हैं, लेकिन फिर भी शाही लकड़हारे का किस्सा दोबारा गाने का मन करता है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि अब तक उन्हें सरकार की तरफ से तो कोई सहायता नहीं मिली है। लेकिन आजकल रागनियों में जो ये बेहुदापन मचा हुआ है, सरकार से मांग है कि इसे रोक हरियाणवी संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। क्योंकि हरियाणा की संस्कृति लुप्त होती जा रही है।
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1971 से रागनियां शुरू कर मास्टर सतबीर सिंह ने मुम्बई, मद्रास, छत्तीसगढ़, यूपी व दिल्ली और हरियाणा में अपनी रागनियों से लोगों के मन को मोहा। उन्होंने सामाजिक किस्सों के अलावा कभी भी समाज में अभाव की रागनियों को तवज्जू नहीं दिया। पंडित लख्मी चंद, धनपत, मेहर सिंह व मांगेराम की हजारों रागनियां गाई। उन्होंने 2012 में जींद जिले के पड़ाना गांव में आखिरी कार्यालय में भाग लिया।
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31 साल तक अनेक लेखकों की रागनियों से लोगों का मन मोहने वाले हरियाणवी कलाकार का कमरा ईनामों व उनकी तस्वीरों से लबालब भरा हुआ है। जहां 2005 में इदियाना, 2005 में रभड़ा और 2016 में उनके धारूहेड़ा निवासी रामबिलास द्वारा हाथ से बनाई गई तस्वीर समेत अनेक तस्वीरें व ईनाम सजे हुए हैं। इसके अलावा उनकी ही एक कविता भी लिखी हुई है।
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ओलंपियन योगेश्वर दत्त के पहले कोच मास्टर सतबीर सिंह का अंतिम संस्कार
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मास्टर सतबीर को श्रद्धांजलि देते हुए ओलम्पिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त ने कहा कि मास्टर सतबीर सिंह उनके पहले गुरू थे। जिन्होंने बहुत कम उम्र में उनका हाथ पकड़ कुश्ती के दांव पेंच सिखाए थे। आज वो जो कुछ भी है उन्हीं बदौलत है। आंखों में आंसू लिए योगेश्वर ने कहा कि वो कल भी उनके पास मौजूद थे। उन्होंने इच्छा जाहिर की थी की उनका सपना है की तुम (योगेश्वर दत्त) ओलम्पिक में गोल्ड जीतो।
ओलंपियन योगेश्वर दत्त के पहले कोच मास्टर सतबीर सिंह का अंतिम संस्कार
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योगेश्वर ने नम आंखों के साथ भरोसा दिलाया कि वो उनका ये सपना जरूर पूरा करेंगे। ओलम्पिक में गोल्ड जीतकर मैं उन्हें सच्ची श्रधांजली दूंगा। क्योंकि गुरू की अहमियत केवल वही समझता है जो गुरू को दिल से मानता है। इसके अलावा योगेश्वर ने घोषणा की कि वो अपने गांव के अखाड़े में उनकी आदमकद प्रतिमा लगाएंगे।