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एक सोच ने बदल दिया पवनचक्की का कांसेप्ट

Sun, 12 Feb 2017 04:05 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,देहरादून
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कोटद्वार के कॉलेज में बॉटनी पढ़ाने वाले अनिल जोशी ने अपनी सोच से घराट (पारंपरिक पनचक्की) का कांसेप्ट ही बदल दिया। पानी पर आधारित इस तकनीक से अब ना सिर्फ अनाज की पिसाई की जाती है, बल्कि इससे बिजली का उत्पादन भी होता है। इस क्षेत्र में काम करने के लिए अनिल जोशी को पद्मश्री से नवाजा गया है। उनकी कोशिश की बदौलत ही केंद्र सरकार ने घराट को घरेलू उद्योग का दर्जा भी दिया है। 
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विज्ञान को आमलोगों तक पहुंचाने के लिए अनिल जोशी ने हिमालयी पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (हैस्को) की संस्थापना की। हैस्को ने घराट पर कार्य करना शुरू किया। घराट में लकड़ी के दो पहिये लगे होते थे, उसके बदले लोहे के पहिये लगाए गए। जिसका फायदा यह हुआ कि घराट से बिजली भी पैदा होने लगी। पानी की उपलब्धता के आधार पर घराट से एक से दस किलोवाट तक की बिजली पैदा की जा सकती है।

अनिल जोशी बताते हैं कि घराट पानी पर आधारित दुनिया की सबसे प्राचीन तकनीक है। इस तकनीक का इस्तेमाल अफगानिस्तान और स्विट्जरलैंड सहित अन्य देशों में किया जाता है। जोशी ने बताया कि जब उन्होंने देखा कि घराट चलाने वालों को समाज में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता तो उन्होंने उनकी जिंदगी बदलने की सोची। इस दिशा में हैस्को के मार्फत से कोशिश की गई तो इसके चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। घराट की तकनीक में कुछ बदलाब करने से जहां इसकी क्षमता में वृद्धि हुई, वहीं इससे बिजली का उत्पादन भी शुरू हो गया। 
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घराट बना कई लोगों का रोजगार का साधन

उन्होंने बताया कि आज घराट कई लोगों के रोजगार का साधन बन गया है और घराट चलाने वाले लोग समाज में सम्मान के साथ रह रहे हैं। हैस्को की कोशिश से अब तक 100 से अधिक घराटों का कायाकल्प किया जा चुका है। उनकी कोशिश की बदौलत केंद्र सरकार ने घराट को घरेलू उद्योग का दर्जा दिया है। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी उस समय केंद्रीय मंत्री के तौर पर उत्तराखंड में घराट की तकनीक  देखने आई थीं।

अनिल जोशी की योजना पर्वतीय प्रदेशों में घराट के माध्यम से बिजली पैदा करने की है। ताकि बिजली उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ सके। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे प्रदूषण नहीं होता है। इसको लेकर कोई अड़चन भी नहीं है। फिर घराट लगाने के लिए हैस्को की ओर से तकनीक के साथ-साथ आर्थिक सहायता भी दी जाती है। 
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हाईलाइट्स -

- घराट के लिए विकसित नई तकनीक से टरबाइन चलाकर एक से दस किलोवाट तक बिजली उत्पादन किया जा सकता है। 
- प्रतिदिन तीन से बीस किलो गेहूं की पिसाई और एक से पांच क्विंटल धान की कुटाई की जा सकती है।
- प्रतिदिन दो क्विंटल रूई की धुनाई की जा सकती है। 
- घराट पर्वतीय क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि मैदानी क्षेत्रों में भी नहरों के किनारे लगाए जा सकते हैं। 
- घराट तकनीक को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन का आयोजन भी हो चुका है। 
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