पता नहीं जगदंबिका पाल बदले या भाजपा, लेकिन सियासी गलियारों में जगदंबिका पाल व राजनाथ सिंह की मुलाकात की खबरों ने हलचल मचा दी है।
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हलचल भाजपा के भीतर भी कम नहीं। खुलकर भले ही कोई कुछ नहीं बोल रहा हो लेकिन भीतर ही भीतर पाल के समर्थन व विरोध में खेमेबाजी शुरू हो गई है।
कुछ को अतीत में भाजपा की जड़ों में मट्ठा डाल चुके पाल को पार्टी में लेने पर आपत्ति है तो कुछ का तर्क है कि इससे कांग्रेस में भगदड़ मचने का संदेश जाएगा।
इससे मोदी की हवा को और रफ्तार मिलेगी। हालांकि एक तबका ऐसा भी है जो पाल के बदलते दिल पर दिल से भरोसा नहीं कर पा रहा है।
आशंका, इसके पीछे कोई गहरी चाल
इस तबके को आशंका है कि बदलते माहौल में पाल का यह नया खेल है। वह भाजपा में जाने का संदेश देकर कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाना चाह रहे हैं, जिससे संजय सिंह की तरह कांग्रेस पर उनका दबाव और दबदबा पहले जैसा हो जाए।
भाजपा ही नहीं पाल के नजदीकी सूत्रों की मानें तो वह बहुत जल्द भगवा चोला धारण कर सकते हैं। बात सिर्फ यह फंसी है कि पाल को पार्टी किस सीट से लड़ाए।
दरअसल, पाल जहां से सांसद हैं, वहां से भाजपा के एक वरिष्ठ नेता जो कि विधायक भी हैं चुनाव लड़ना चाहते हैं। इसलिए भाजपा चाहती है कि पाल को किसी दूसरी ऐसी सीट से लड़ाया जाए जहां से पार्टी की तरफ से राजनीतिक संदेश दिया जा सके।
साथ ही पूर्वांचल के सामाजिक समीकरणों में ठाकुरों के फैक्टर को ठीक किया जा सके।
पाल दे चुके हैं अटल को करारा झटका
जगदंबिका पाल के भाजपा में आने की खबरों के साथ ही लोगों की आंखों के सामने पाल और भाजपा की दोस्ती के दुश्मनी में बदलने की घटना घूमने लगी है।
20 फरवरी 1998 की बात है। वर्ष 1998-99 में कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में जगदंबिका पाल भाजपा गठबंधन की सरकार में ही मंत्री थे। अगले दिन लोकसभा चुनाव का दूसरे या तीसरे चरण का मतदान होना था।
मुलायम सिंह यादव भी लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। पाल अचानक राजभवन पहुंच गए और तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी को लोकतांत्रिक कांग्रेस का कल्याण सरकार से समर्थन वापसी का पत्र सौंप दिया।
पाल ने ठोंक दिया झूठा वादा
पाल ने दावा ठोंक दिया कि उन्हें समाजवादी पार्टी ने समर्थन दे दिया है। राज्यपाल ने पाल के दावे पर यकीन करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। सियासी तूफान खड़ा हो गया।
अटल बिहारी वाजपेयी विशेष विमान से सीधे लखनऊ पहुंचे। उच्च न्यायालय से होता हुआ मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया। न्यायालय ने कल्याण सिंह को ही मुख्यमंत्री माना। जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हुए।
हालांकि बाद में सदन में विश्वासमत के दौरान लोकतांत्रिक कांग्रेस के ही कई साथी उनसे अलग हो गए और वे पराजित हो गए।
राजनाथजी, भूल गए सब कुछ?
इस पूरे एपीसोड में पाल ने राजनाथ सिंह पर भी जमकर निशाना साधा था। कई आरोप लगाए थे। राजनाथ ने भी पाल को लेकर तमाम बातें कही थीं।
पर, बदली सियासी बयार ने अतीत की दुश्मनी पर चादर डाल दी है। अतीत को भूलकर दोनों तरफ से दोस्ती के हाथ बढ़ गए हैं।
बताया जा रहा है कि भाजपा पाल को पार्टी में लेकर सूबे में यह संदेश देना चाहती है कि जमीन से कांग्रेस के पैर उखड़ चुके हैं।
साथ ही पूर्वांचल के क्षत्रिय वोट की लामबंदी को और मजबूत करना चाहती है।
पर, पाल की भी मजबूरी
मामला एकतरफा नहीं है। पाल की भी अपनी मजबूरी है। वह लंबे समय से कांग्रेस में उपेक्षित चल रहे हैं।
राजनीतिक हवा के पारखी पाल के दिल व दिमाग में कहीं न कहीं यह आशंका पैदा हो गई है कि मौजूदा स्थिति में कांग्रेस से उनका लोकसभा पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
नई कश्ती की सवारी के लिए उनके लिए भाजपा से ज्यादा अच्छा विकल्प दूसरा नहीं हो सकता था। इसलिए उन्होंने भी गिले-शिकवे भूल भाजपा की तरफ कदम बढ़ा दिए।
पाल भी अपनी सीट से ही चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। भाजपा सूत्र बताते हैं कि इस गुत्थी को अगले एक-दो दिन में सुलझा लिया जाएगा और पाल पार्टी में शामिल हो जाएंगे।
इस सबके बावजूद कुछ सवाल बरकरार हैं। पाल ने जिस तरह कल्याण की सरकार को गिराने की कोशिश की, उसे क्या कल्याण जैसा नेता आसानी से भुला पाएगा?
कल्याण से इस बारे में जब पूछा गया तो उन्होंने सिर्फ ‘नो कमेंट’ कहकर बात खत्म कर दी। अन्य सवालों पर भी यही कहा कि उन्हें ‘नो कमेंट’ के आगे व पीछे कुछ नहीं कहना है।
पर, कल्याण का जैसा स्वभाव है, उसको देखते हुए यह मानना बहुत मुश्किल है कि वह पाल को आसानी से हजम कर पाएंगे।
सिर्फ कल्याण सिंह ही नहीं बल्कि अन्य कई नेता भी ऐसे हैं जो इस बदलाव को बहुत आसानी से हजम नहीं कर पाएंगे। भले ही बड़े नेताओं से मामला जुड़ा होने के कारण सार्वजनिक रूप से कुछ न बोल रहे हों।