हम सबके भीतर रहता है
हर कोने में बुद्ध अधूरा !
त्यक्त किन्तु सहचरी बनी हैं
जाने कितनी यशोधराएं
सुख दुख पैदा करती रहतीं
उगती ढलती सौ तृष्णाएं
उड़का हुआ द्वार है मन का
मुक्त और अवरुद्घ अधूरा !
कितनी बार सहज होने को
घेरे रहती है असहजता
होठों पर तिरती मुस्कानें
ऑखों से पानी है बहता
मध्यम मार्ग खोजता है मन
मुग्ध अधूरा क्रुद्ध अधूरा !
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एक अधूरापन ढोती है
थकी हुयी जीवन की यात्रा
एक खोज है इस जीवन में
किस किस की हो कितनी मात्रा ?
कुछ भी पूरा नहीं हो सका
शान्ति अधूरी युद्ध अधूरा !
साभार: ज्ञानप्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से