घड़ी से लाख महँगा तो घड़ी का वक़्त होता है
जो इसकी क़द्र करता है उसी का वक्त होता है
उदासी लुत्फ़ लेने को चली आती है महलों से
हमारी झोपड़ी में जब ख़ुशी का वक़्त होता है
जकड़ लेती है पैरों को हमारे गाँव की मिट्टी
दुबारा शहर को जब वापसी का वक्त होता है
यही वो उम्र है जब चाहकर भी मर नहीं सकते
यही वो उम्र है जब ख़ुद-कुशी का वक़्त होता है
सितम ये है कि हम जैसे ग़रीबों की कलाई में
घड़ी होती किसिस की है किसी का वक्त होता है
~ आदित्य सिंह “आदी”
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