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Urdu Poetry: सैलाब का गुज़र भी तो लोगों की मौत है

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            सैलाब का गुज़र भी तो लोगों की मौत है
        
                                                    
                            
दरिया का बाँझ-पन जहाँ नहरों की मौत है

कुछ भी तो कहना रू-ब-रू बहरों के है फ़ुज़ूल
जैसे ख़ला में चीख़ना चीख़ों की मौत है

रस्ता सड़क तलक न मुसाफ़िर को दें अगर
मेरे ख़याल में तो ये गलियों की मौत है

आँखों से नींद के सभी आसार गुम-शुदा
शब भर हमारा जागना ख़्वाबों की मौत है

माहौल की हिफ़ाज़तें लाज़िम हैं दोस्तो
तितली की मौत अस्ल में फूलों की मौत है

बारिश हो धूप में कि धनक आसमाँ पे हो
आँखें न हों तो ये भी नज़ारों की मौत है

बिखरे पड़े हैं जा-ब-जा कितने ही ख़ाल-ओ-ख़द
या'नी कि टूटा आइना चेहरों की मौत है

बे-शक फ़सील जी उठी गारे के वार से
लेकिन 'ज़मान' ये तो दराड़ों की मौत है

~ शोएब ज़मान

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