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शोएब अख़्तर: ज़िंदगी से 'इश्क़ यूँ करता रहा

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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ज़िंदगी से 'इश्क़ यूँ करता रहा


मौत से मैं 'उम्र भर डरता रहा

वक़्त और हालात के हर ज़ख़्म को
मरहम-ए-उम्मीद से भरता रहा

बस कि क़ाएम हो सके अम्न-ओ-अमाँ
दुश्मनों से दोस्ती करता रहा

ज़िंदगी थी बे-वफ़ा तो क्या हुआ
मैं तो उम्मीद-ए-वफ़ा करता रहा

थे वफ़ा की राह में काँटे बहुत
मैं उसी रस्ते सफ़र करता रहा

ज़िंदगी की चाह में क्या सोच कर
ज़िंदगी की मौत मैं मरता रहा
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3 घंटे पहले
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