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शहज़ाद क़ैस की ग़ज़ल: ख़ुशी ने दिल सा दुखाया तो बाप रोने लगा

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            पुराने घर को गिराया तो बाप रोने लगा
        
                                                    
                            
ख़ुशी ने दिल सा दुखाया तो बाप रोने लगा

जो अम्मी न रहीं तो क्या हुआ कि हम सब हैं
जवाब बन नहीं पाया तो बाप रोने लगा

ये रात खाँसते रहते हैं कोफ़्त होती है
बहू ने सब में जताया तो बाप रोने लगा

बिठा के रिक्शे में कल शब रवाना करते हुए
दिया जो मैं ने किराया तो बाप रोने लगा

हमें बना दिए कमरे ख़ुद उस को टी वी पर
मदीना जब नज़र आया तो बाप रोने लगा

कल उस के दोस्त को बाहर से टालने के बाद
उसे फ़क़ीर बताया तो बाप रोने लगा

बहन रवानगी से पहले प्यार लेने गई
जो कुछ भी दे नहीं पाया तो बाप रोने लगा

किया ही क्या है भला आज तक हमारे लिए
सवाल जूँही उठाया तो बाप रोने लगा

तबीब कहता था पागल को कुछ भी याद नहीं
गले से मैं ने लगाया तो बाप रोने लगा

न जाने 'क़ैस' ने किस जज़्बे से ये क्या लिक्खा
कि जूँही पढ़ के सुनाया तो बाप रोने लगा

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