विज्ञापन

Urdu Poetry: आख़िरी नाव न आई तो कहाँ जाऊँगा

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            यूँ बड़ी देर से पैमाना लिए बैठा हूँ
        
                                                    
                            
कोई देखे तो ये समझे कि पिए बैठा हूँ

आख़िरी नाव न आई तो कहाँ जाऊँगा
शाम से पार उतरने के लिए बैठा हूँ

मुझ को मालूम है सच ज़हर लगे है सब को
बोल सकता हूँ मगर होंट सिए बैठा हूँ

लोग भी अब मिरे दरवाज़े पे कम आते हैं
मैं भी कुछ सोच के ज़ंजीर दिए बैठा हूँ

ज़िंदगी भर के लिए रूठ के जाने वाले
मैं अभी तक तिरी तस्वीर लिए बैठा हूँ

कम से कम रेत से आँखें तो बचेंगी 'क़ैसर'
मैं हवाओं की तरफ़ पीठ किए बैठा हूँ

~ क़ैसर-उल जाफ़री

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 

10 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Adv DK Kanojiya

71 कविताएं

View Profile