अभी तो यहां पर बड़ी सर्दियां हैं
हवाएं हैं ऐसी कि ज्यों बरछियां हैं
निकलो न तुम सरबरहना सड़क पर
के नभ में कड़कती हुई बिजलियां हैं
ये बच्चे ये बूढ़े ये कोहरे की चादर
कि निस्तेज सूरज की सब बत्तियां हैं
अभी लेट कर घर में सोए रहो बस
निगाहों में मौसम की बेशर्मियां हैं
अभी तुम तो कमनीय टहनी हो कोई
नरम सी तुम्हारी अभी डालियां हैं
सुनो गर तुम्हें भी सुनाई पड़ेगी
कहां से ये आती हुई सिसकियां हैं
खुली झोपड़ी है रजाई भी जर्जर
है बूढ़ा बदन अनसुनी अर्जियां हैं
उठा ले उसे कोई ऐसे में आकर
पढ़ ले जो उसने लिखी चिट्ठियां हैं
~ ओम निश्चल
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