मौसम-ए-गुलज़ार-ए-हस्ती इन दिनों क्या है न पूछ
तू ने जो देखा सुना क्या मैं ने देखा है न पूछ
हाथ ज़ख़्मी हैं तो पलकों से गुल-ए-मंज़र उठा
फूल तेरे हैं न मेरे बाग़ किस का है न पूछ
रात अँधेरी है तो अपने ध्यान की मश'अल जला
क़ाफ़िले वालों में किस को किस की परवा है न पूछ
जो तिरा महरम मिला उस को न थी अपनी ख़बर
शहर में तेरा पता किस किस से पूछा है न पूछ
यूँ तो जितने फूल से चेहरे हैं कुम्हला जाएँगे
इन भरी आबादियों में कौन तन्हा है न पूछ
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