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हस्तीमल 'हस्ती' की ग़ज़ल: सच के हक़ में खड़ा हुआ जाए

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            सच के हक़ में खड़ा हुआ जाए 
        
                                                    
                            
जुर्म भी है तो ये किया जाए ।

हर मुसाफ़िर में ये शऊर कहाँ,
कब रुका जाए कब चला जाए ।

हर क़दम पर है गुमराही,
किस तरफ़ मेरा काफ़िला जाए ।

बात करने से बात बनती है,
कुछ कहा जाए कुछ सुना जाए ।

राह मिल जाए हर मुसाफ़िर को,
मेरी गुमराही काम आ जाए ।

इसकी तह में हैं कितनी आवाजें
ख़ामशी को कभी सुना जाए ।

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