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हकीम 'नासिर': दिल में हज़ार ज़ख्म थे जो न उन्हें दिखा सके

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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आँखों ने हाल कह दिया होंट न फिर हिला सके
दिल में हज़ार ज़ख्म थे जो न उन्हें दिखा सके

घर में जो इक चराग़ था तुम ने उसे बुझा दिया
कोई कभी चराग़ हम घर में न फिर जला सके

शिकवा नहीं है अर्ज़ है मुमकिन अगर हो आप से
दीजे मुझ को ग़म ज़रूर दिल जो मिरा उठा सके

वक़्त क़रीब आ गया हाल अजीब हो गया
ऐसे में तेरा नाम हम फिर भी न लब पे ला सके

उस ने भुला के आप को नजरों से भी गिरा दिया
‘नासिर’-ए-ख़स्ता-हाल फिर क्यूँ न उसे भुला सके 
 
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