विज्ञापन

बशीर बद्र: मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई
मुझे एक मुट्ठी ज़मीन दे ये ज़मीन कितनी सिमट गई

तिरी याद आए तो चुप रहूँ ज़रा चुप रहूँ तो ग़ज़ल कहूँ
ये ‘अजीब आग की बेल थी मिरे तन-बदन से लिपट गई

मुझे लिखने वाला लिखे भी क्या मुझे पढ़ने वाला पढ़े भी क्या
जहाँ मेरा नाम लिखा गया वहीं रौशनाई उलट गई

न कोई ख़ुशी न मलाल है कि सभी का एक सा हाल है
तिरे सुख के दिन भी गुज़र गए मिरी ग़म की रात भी कट गई

मिरी बंद पलकों पे टूट कर कोई फूल रात बिखर गया
मुझे सिसकियों ने जगा दिया मिरी कच्ची नींद उचट गई
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

dinesh chauhan

3544 कविताएं

View Profile

Manoj Kumar

420 कविताएं

View Profile