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Ammar Iqbal Poetry: यूँ बुनी हैं रगें जिस्म की, एक नस टस से मस और बस

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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रंग-ओ-रस की हवस और बस
मसअला दस्तरस और बस

यूँ बुनी हैं रगें जिस्म की


एक नस टस से मस और बस

सब तमाशा-ए-कुन ख़त्म शुद


कह दिया उस ने बस और बस

क्या है माबैन-ए-सय्याद-ओ-सैद


एक चाक-ए-क़फ़स और बस

उस मुसव्विर का हर शाहकार


साठ पैंसठ बरस और बस

2 वर्ष पहले
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