हिंदी हैं हम शब्द-श्रृंखला में आज का शब्द है 'विभव' जिसके अर्थ हैं ऐश्वर्य ; शक्ति ; संपत्ति ; वैभव। कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है।
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
सब द्वारों पर भीड़ मची है,
कैसे भीतर जाऊं मैं?
द्बारपाल भय दिखलाते हैं,
कुछ ही जन जाने पाते हैं,
शेष सभी धक्के खाते हैं,
क्यों कर घुसने पाऊं मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
तेरी विभव कल्पना कर के,
उसके वर्णन से मन भर के,
भूल रहे हैं जन बाहर के
कैसे तुझे भुलाऊं मैं?
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
बीत चुकी है बेला सारी,
किंतु न आयी मेरी बारी,
करूं कुटी की अब तैयारी,
वहीं बैठ गुन गाऊं मैं।
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
कुटी खोल भीतर जाता हूं
तो वैसा ही रह जाता हूं
तुझको यह कहते पाता हूं-
'अतिथि, कहो क्या लाऊं मैं?'
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?