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आज का शब्द: जप और श्रीविलास सिंह की कविता- धूप की नदी

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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                                                  'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- जप, जिसका अर्थ है- किसी मंत्र, नाम या वाक्य का बार-बार किया जाने वाला उच्चारण। प्रस्तुत है श्रीविलास सिंह की कविता- धूप की नदी

मैं कब से बैठा हूँ 
अँधेरे के इस पहाड़ की 
तलहटी में, 
अभी-अभी गुज़रे हैं इधर से 
कुछ उदंड अश्वारोही 
अपनी तलवारों पर हाथ फेरते 
बेहद फूहड़ और भयानक हँसी के साथ। 

मगर इस बात को तो 
सदियाँ हो गईं। 

धुएँ के कई बादल 
मरने वालों की चीख़ों पर सवार 
इसी अँधेरे के पहाड़ में दफ़न हैं। 

मैं अपनी प्यास की कुदाल से खोद रहा हूँ 
बरसों से अपनी इच्छाओं की रेत 
फूट पड़े हैं मेरे चारों ओर 
आग बरसाती धूप के सोते। 
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कई पैग़ंबर यहीं मेरे पास ही 
बैठकर सुस्ताने के बाद 
चले गए किसी अनजानी दिशा को 
अपने कंधों पर अपनी सलीबें उठाए। 

इसी तलहटी से 
उठते रहे हैं कई इंक़लाब 
और रक्त की नदी पार करने के बाद 
गुम हो गए हैं ध्वंस के बाँझ रेगिस्तानों में, 
उनके पीछे उग आए हैं 
कुछ नए तानाशाह 
कैक्टस की तरह। 

इसी घाटी में रोशनी की किताबें 
जल रहीं है धू-धू कर 
और उनके ज़हरीले धुएँ के नशे में मस्त 
मेरी तमाम पीढ़ियाँ 
जप रही हैं मंत्र 
एक अनबूझी भाषा का 
किसी गूँगे-बहरे अदृश्य की 
प्रार्थना में। 

इसी पहाड़ के सामने वाली दलदल में 
डूब कर मर गए हैं 
बाईं और दाईं ओर से आने वाले 
सत्य के तमाम अन्वेषक 
जिन्होंने दावा किया था 
सूरज का एक टुकड़ा तोड़ लाने का। 

सब तरफ़ एक मरघट 
उग आया है 
सारे पैग़ंबरों और 
सत्य के अन्वेषकों को फूँकने के बाद, 
सारी पवित्र किताबें सड़ चुकी हैं 
रक्त में डूबकर, 
सूरज कब का 
उजाले को सँभाले-सँभाले अपने कँधों पर 
धूप की नदी-सा बहने लगा है, 
अँधेरे की तलहटी में 
अभी भी गूँज रही है 
आदमख़ोर अश्वारोहियों के 
आने की आहट।
3 वर्ष पहले
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